सुविचार

आज से अपना दीया जलाएं और दिल की गहराइयों को छू लें!

अंधेरे में भी एक छोटा सा दीया जलाने से रास्ता दिखने लगता है। मेहनत का पहला कदम ही सफलता की नींव रखता है।

एक छोटे से गांव की मिट्टी में जहां हर सांस में गरीबी की कड़वाहट घुली थी, वहीं रामू नाम का एक नाजुक सा लड़का रहता था। उसकी आंखें हमेशा नम नजर आतीं।  मां की कमजोर हड्डियां देखकर जो सुबह से शाम तक खेतों में झुककर मजदूरी करतीं और रात को दर्द से कराह उठतीं। वैसे में रामू का सपना था डॉक्टर बनना। ताकि मां को वो दर्द निवारक दवा खुद दे सके, जो वो कभी खरीद नहीं पाते।

लेकिन रातें काली अमावस की तरह घनी थीं, बिजली का साया तक न था और रामू की किताबें सिर्फ सपनों की तरह धूल में दबी रहतीं। स्कूल में नंबरों की कमी से दोस्तों के ताने उसके दिल को चीरते-रामू, तू तो बस रोने वाला है! और घर लौटते हुए वह अकेले में सिसकियां भरता- भगवान, मां को ये दर्द कब तक सहना पड़ेगा? मेरा अंधेरा कब छंटेगा?

एक सर्द बारिश वाली शाम, जब ठंड हड्डियों तक उतर आई और रामू की किताबें पानी से लथपथ हो रही थीं, उसके दादाजी ने बिस्तर से उठकर कांपते कदमों से एक पुराना जंग खाया तेल का दीया निकाला। दादाजी की आंखें आंसुओं से भरी थीं।  वे जानते थे कि रामू का सपना उनके बेटे का अधूरा सपना था, जो गरीबी की चपेट में जवान ही चला गया, छोड़कर एक विधवा पत्नी और एक अनाथ सा बेटा।

दादाजी ने रामू को सीने से लगाया, उनकी सांसें भारी थीं- बेटा, ये दीया तेरे पिताजी का आखिरी तोहफा था। उन्होंने कहा था कि इसकी ज्योति कभी बुझने न देना। इसे जलाओ, और हर रात सिर्फ एक घंटा पढ़ो। अंधेरा कितना भी डरावना हो, लेकिन ये छोटी सी लौ तेरे दिल के घावों को छू लेगी। याद रख, पहला कदम ही आंसुओं को दुआओं में बदल देता है।

रामू ने दीया हाथ में लिया तो उसके उंगलियां ठंड से सुन्न हो गईं और आंसू गालों पर लुढ़क पड़े। दादाजी, ये दीया तो छोटा है… मेरा दर्द तो इतना गहरा है कि समंदर भी भर न जाए। मां की सिसकियां सुनकर मेरा दिल टूट जाता है- वह कांपते स्वर में बोला। दादाजी ने उसके सिर पर हाथ फेरा- रो ले बेटा, लेकिन रोते हुए भी कदम बढ़ा। तेरी मां की दुआएं तेरे पिताजी की यादें- ये सब इस दीये में बसती हैं।

रामू ने पहली रात कोशिश की। दीये की कमजोर ज्योति में शब्द कांपते नजर आए, आंखें जल उठीं, लेकिन वह रुका नहीं। मां ने दरवाजे की झिरी से झांका तो उनका दिल पिघल गया।  मेरा लाल, इतने दर्द में भी लड़ रहा है। वह चुपके से आंसू पोंछी और प्रार्थना की- हे राम, इसे ताकत दे। दूसरे दिन, तीसरे… रामू के आंसू किताबों पर गिरते, हर पन्ने पर मां की थकी मुस्कान तैरती। वह दादाजी को गले लगाकर रोता- दादाजी, पिताजी होते तो गर्व करते।

धीरे-धीरे एक घंटा दो में बदल गया। रातें अब सिर्फ अंधेरी नहीं, बल्कि उन आंसुओं से नहाई हुई लगने लगीं, जो उम्मीद की माला बन गईं। रामू मां के पैर दबाता, दादाजी से पुरानी कहानियां सुनता और सोचता कि ये दीया मेरा परिवार है, जो मेरे टूटे टुकड़ों को जोड़ रहा है।

स्कूल के एग्जाम का दिन आया। रामू ने न सिर्फ टॉप किया, बल्कि अपना नाम गांव की शान बना दिया। रिजल्ट सुनते ही वह घर भागा। मां ने उसे देखा तो आंसुओं का बांध टूट पड़ा- बेटा… तूने मां का दर्द मिटा दिया। वे दोनों रोते हुए गले मिले- जैसे सारी दुनिया की पीड़ा बह गई। दादाजी ने दीया जलाया, उनकी कांपती उंगलियां अब स्थिर थीं। बेटा, तेरा पहला कदम ही हमें जन्नत लौटा आया। तेरे पिताजी मुस्कुरा रहे होंगे। रामू ने फुसफुसाया- ये ज्योति ने नहीं, हमारे साझे आंसुओं ने रास्ता रोशन किया।

आज रामू एक संवेदनशील डॉक्टर है। हर मरीज के दर्द को वह अपना दर्द समझता है और कहता है कि अंधेरे में सिसकिए मत, दीया जलाओ। पहला कदम उठाओ, क्योंकि वह कदम मां की गोद, दादा की दुआ और खोए हुए सपनों का आलिंगन है। और हर रात वह अपना पुराना दीया जलाता है- वो ज्योति अब भी चुपके से आंसू बहाती और मुस्कान लाती है।

संदेश: जीवन के घाव संवेदनशील बनाते हैं, लेकिन वही आंसू हमें नई जिंदगी देते हैं। आज से अपना दीया जलाएं और दिल की गहराइयों को छू लें! 💔🕯️✨

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.