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Make in India: नालंदा के इस गांव के युवक का कमाल देख चीन तक हैरान!

Make in India: Even China is surprised to see the amazing feat of a youth from Nalanda village!
Make in India: Even China is surprised to see the amazing feat of a youth from Nalanda village!

नालंदा दर्पण डेस्क। Make in India: बिहार के ऐतिहासिक जिले नालंदा के एक छोटे से गांव कन्हैयागंज से निकली एक बड़ी खबर ने पूरे देश को गर्व से भर दिया है। यहां के स्थानीय कारीगरों ने वह कर दिखाया है, जो अब तक सिर्फ चीन का एकाधिकार माना जाता था। ‘स्विंग स्टार’ नामक हाईटेक झूले का निर्माण अब भारत में, वह भी गांव के कारीगरों द्वारा सफलतापूर्वक किया गया है।

चीन से मंगाया जाने वाला यह झूला करीब 1.5 करोड़ रुपये का पड़ता था, लेकिन अरविंद विश्वकर्मा और पिंटू विश्वकर्मा के नेतृत्व में गांव के युवाओं ने इसे महज 60 लाख रुपये में तैयार कर दिखाया है। यह केवल लागत में भारी कमी नहीं, बल्कि मेक इन इंडिया की ज़मीन पर उतरी एक मिसाल है, जो तकनीक, आत्मनिर्भरता और देसी हुनर का अद्भुत संगम है।

स्विंग स्टार झूले को तैयार करने में करीब दो महीने का समय लगा। यह झूला पूरी तरह से ऑटोमैटिक है और एक बार में 30 लोग इसमें झूल सकते हैं। इसकी हाइड्रोलिक सिस्टम और मूवमेंट टेक्नोलॉजी का ट्रायल सफल हो चुका है। अब इसमें सीटें लगाकर अंतिम ट्रायल की तैयारी की जा रही है। मौसम अनुकूल रहा तो यह प्रक्रिया 10-12 दिनों में पूरी हो जाएगी।

अरविंद विश्वकर्मा ने पहली बार यह झूला सोशल मीडिया पर देखा था, जो कर्नाटक के एक मेले में लगा हुआ था। जब उन्हें पता चला कि वह झूला चीन से मंगाया गया है और बेहद महंगा है तो उन्होंने इसे भारत में ही बनाने की ठानी। यूट्यूब और ऑनलाइन संसाधनों से जानकारी लेकर उन्होंने अपने गांव के युवाओं की एक टीम बनाई और इस सपने को साकार कर दिखाया।

ऑटोमेशन सिस्टम तैयार करने के लिए दिल्ली से विशेष प्रशिक्षण लिया गया और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग की मदद से झूले को पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत बनाया गया। इसमें तीन नियंत्रण बटन हैं- चालू, बंद और इमरजेंसी स्टॉप।

कन्हैयागंज के कारीगर इससे पहले भी 20 सीटर ‘तरंगा’ और 24 सीटर ‘सुनामी’ जैसे आधुनिक झूले बना चुके हैं। यहां का झूला निर्माण क्लस्टर मेक इन इंडिया अभियान से जुड़ा हुआ है, लेकिन उचित प्रचार और नेटवर्किंग के अभाव में यह हुनर देश भर में अपनी पहचान नहीं बना पा रहा।

बहरहाल, यह कहानी केवल एक झूले की नहीं, बल्कि भारत के गांवों में छिपी उस प्रतिभा की है जो सीमित संसाधनों में भी दुनिया को चौंकाने का माद्दा रखती है। नालंदा के इस नवाचार को अगर सरकारी सहायता, तकनीकी समर्थन और बाज़ार की पहुंच मिले तो यह गांव देश का ‘झूला हब’ बन सकता है।

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