
नालंदा दर्पण डेस्क। तमाम सरकारों की कालिख अपने दामन में समेटे मुहाने नदी आज मरणासन्न अवस्था में पड़ी है। यह वही नदी है जो कभी जीवन देती थी, आज वही नदी मृत्यु दायिनी बनती जा रही है। क्योंकि नदियां जानती हैं उनके मरने के बाद सभ्यताओं के मरने की बारी आती है।
किसी शायर ने सच ही कहा है कि ‘समंदर न सही, पर एक नदी तो होनी चाहिए, तेरे शहर में ज़िंदगी कहीं तो होनी चाहिए’। लेकिन आज इस्लामपुर और चंडी के लोगों के पास ऐसी कोई नदी नहीं बची, जिस पर वे गर्व कर सकें। मुहाने नदी, जो कभी इस पूरे इलाके की पहचान हुआ करती थी, आज सरकारी फाइलों और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच दम तोड़ रही है।
तस्वीरों में कैद कड़वा सचः हरियाली के नीचे छिपी सड़ांध
अटैच तस्वीरों में दूर-दूर तक फैली हरी परत दिखती है। पहली नजर में यह हरियाली सुकून देती है, लेकिन पास जाकर देखने पर यह हरियाली नहीं, जल-कुंभी और गाद का साम्राज्य है। नदी का जल प्रवाह लगभग खत्म हो चुका है। पानी ठहरा हुआ है, सांस नहीं ले पा रहा।
दूसरी तस्वीर में नदी किनारे की हालत और भी भयावह है। बेतरतीब कचरा डंपिंग, प्लास्टिक, मलबा और घरेलू अपशिष्ट, नदी पाट पर अतिक्रमण, बस्तियों का सीधे नदी में गिरता हुआ गंदा पानी जैसे दृश्य किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि मानव निर्मित हत्या का प्रमाण है।
कभी शहर का सीना चीरती थी मुहाने नदी
एक समय था जब मुहाने नदी इस्लामपुर और चंडी के बीच से होकर बहती थी। नदी के दोनों किनारों पर जीवन पलता था। किसान इसी नदी से खेतों की सिंचाई करते थे। मवेशी अपनी प्यास बुझाते थे। बच्चे नदी में तैरना सीखते थे और बुजुर्ग नदी के किनारे बैठकर बीते वक्त की कहानियां सुनाते थे।
बाढ़ की यादें आज भी बुजुर्गों के जेहन में जिंदा हैं। जब मुहाने उफान पर होती थी, डर भी था, पर नदी के जिंदा होने का एहसास भी था। आज बाढ़ नहीं आती, क्योंकि नदी ही नहीं बची।
विकास की अंधी दौड़ में खो गई जीवनरेखा
शहर के पास आज बहुत कुछ है। पक्की सड़कें, बहुमंजिला मकान, बाजार, दुकानें और नई कॉलोनियां, लेकिन शहर की जीवन रेखा खो गई। विकास की अंधाधुंध बयार में मुहाने नदी को नाले में बदल दिया गया। जहां कभी साफ पानी बहता था, आज वहां सीवर बहता है।
विडंबना यह है कि विकास की हर योजना में सड़कें, भवन और सौंदर्यीकरण शामिल हैं, लेकिन नदी का पुनर्जीवन कहीं एजेंडे में नहीं है।
प्रशासनिक उदासीनता: फाइलों में जिंदा, जमीन पर मृत
मुहाने नदी आज भी राजस्व और जल संसाधन विभाग के नक्शों में मौजूद है। सरकारी रिकॉर्ड में यह नदी बह रही है, लेकिन जमीनी हकीकत तस्वीरों में साफ दिखती है।
न नियमित सफाई, न अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई, न प्रदूषण रोकने की योजना, न ही सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था, हर सरकार आई, हर प्रतिनिधि ने वादे किए, लेकिन मुहाने नदी सिर्फ भाषणों में बची रही।
नदी नहीं, नाला समझ लिया गया
सबसे बड़ा अपराध यही हुआ कि मुहाने नदी को नदी समझना ही छोड़ दिया गया। उसे नाले की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। घरों का गंदा पानी, बाजारों का कचरा, निर्माण का मलबा सब कुछ इसी में उड़ेल दिया गया।
नतीजतन जल-कुंभी ने नदी की सांस रोक दी। पानी का बहाव थम गया। मच्छरों और बीमारियों का खतरा बढ़ गया। आसपास के मोहल्लों में दुर्गंध आम हो गई।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर सीधा हमला
स्थानीय लोग बताते हैं कि गर्मी और बरसात के मौसम में हालात और बदतर हो जाते हैं। मलेरिया, डेंगू, स्किन डिजीज, सांस की समस्याएं; ये सब मुहाने नदी की बदहाली से जुड़ी हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग और नगर प्रशासन आंख मूंदे बैठे हैं।
नई पीढ़ी को नहीं पता, नदी क्या होती है
सबसे दुखद पहलू यह है कि इस्लामपुर और चंडी की नई पीढ़ी ने मुहाने नदी को कभी बहते हुए देखा ही नहीं। उनके लिए यह सिर्फ एक बदबूदार, हरे रंग का गड्ढा है। जिस नदी से शहर की पहचान थी, वह पहचान अब इतिहास बनती जा रही है।
क्या अब भी बचाई जा सकती है मुहाने नदी?
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अभी भी ईमानदार प्रयास हों तो मुहाने नदी को बचाया जा सकता है। नदी पाट से अतिक्रमण हटे, सीवेज का ट्रीटमेंट हो, जल-कुंभी की नियमित सफाई, नदी किनारे हरित पट्टी, स्थानीय लोगों की भागीदारी तय हो। लेकिन इसके लिए सामाजिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए, जो अब तक नजर नहीं आई।
नदी बचेगी तो शहर बचेगा
मुहाने नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं थी, वह इस्लामपुर और चंडी की आत्मा थी। नदी के मरने का मतलब है संस्कृति, स्मृति और सभ्यता का मरना। नदियां जब मरती हैं तो सिर्फ पानी नहीं सूखता, इंसानों का भविष्य भी सूखने लगता है।
अब सवाल यह है कि क्या मुहाने नदी को मरने दिया जाएगा या इस्लामपुर-चंडी के लोग इसे फिर से जिंदा करने का संकल्प लेंगे? क्योंकि ‘समंदर न सही, पर एक नदी तो होनी चाहिए…’
स्रोतः नालंदा दर्पण डेस्क के लिए जयप्रकाश नवीन / मुकेश भारतीय का आलेख





