नालंदा विधानसभा: JDU के सामने नई चुनौतियां, ढह सकता है श्रवण का किला

नालंदा दर्पण डेस्क / मुकेश भारतीय। बिहार की राजनीति में नालंदा विधानसभा क्षेत्र को ‘सरवन कुमार उर्फ श्रवण कुमार का किला’ कहा जाता है। 1995 से लेकर 2020 तक लगातार सात बार विधायक चुने जा चुके जनता दल (यूनाइटेड) के दिग्गज नेता सरवन कुमार ने इस सीट को नीतीश कुमार की पार्टी का मजबूत गढ़ बना दिया है।

लेकिन जैसे-जैसे 2025 विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, जिसकी मतदान की तारीख 6 नवंबर तय है और उसका रिजल्ट 14 नवंबर को आएगा, इस बार यह किला हिलने के संकेत दे रहा है। जातिगत समीकरणों में बदलाव, विपक्ष की एकजुटता और नई पार्टियों का उदय इस बार श्रवण कुमार की राह में कांटे बिछा सकता है।

आइए, नालंदा के चुनावी इतिहास के आंकड़ों का गहरा विश्लेषण करें, जहां हार-जीत की कहानी न केवल राजनीतिक उथल-पुथल की गवाह है, बल्कि बिहार की ग्रामीण राजनीति के आईने की तरह चमकती है।

शुरुआती दौर: स्वतंत्रता बाद का अस्थिर दौर (1977-1990)

नालंदा विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1977 में हुई थी, जब बिहार की विधानसभा सीटों का पुनर्गठन हुआ। इससे पहले 1952-1972 के चुनावों में यह क्षेत्र अलग-अलग नामों या सीमाओं के तहत लड़ा जाता था, लेकिन वर्तमान स्वरूप में पहला चुनाव 1977 का था। इस दौर में नालंदा की राजनीति अस्थिर रही। कांग्रेस और स्वतंत्र उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर होती रही।

1977: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के श्याम सुंदर प्रसाद ने जीत हासिल की, लेकिन मार्जिन बेहद संकुचित था- केवल 1008 वोट। कुल 25,907 वोट पाकर वे जीते, जबकि जनता पार्टी (JNP) के कृष्णदेव प्रसाद दूसरे नंबर पर रहे। अन्य प्रमुख उम्मीदवारों में स्वतंत्र वेद प्रकाश सिंह (9,104 वोट) शामिल थे। यह जीत इमरजेंसी के बाद कांग्रेस की कमजोरी को दर्शाती है।

1980: स्वतंत्र उम्मीदवार राम नरेश सिंह ने धमाकेदार वापसी की। 45,547 वोटों से वे जीते।  मार्जिन रहा 12,503 वोट। कांग्रेस (I) के श्याम सुंदर प्रसाद दूसरे स्थान पर रहे। अन्य में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के रामचंद्र प्रसाद (6,584 वोट) उल्लेखनीय थे। यह दौर स्थानीय प्रभावशाली नेताओं का था, जहां पार्टियां कम और व्यक्तिगत अपील ज्यादा काम करती थीं।

1985: कांग्रेस ने फिर वापसी की। श्याम सुंदर सिंह ने 38,818 वोटों से जीत दर्ज की। उनका मार्जिन 5,066 वोट रहा। स्वतंत्र राम नरेश सिंह दूसरे नंबर पर रहे। अन्य उम्मीदवारों में स्वतंत्र नरेश यादव (3,088 वोट) शामिल थे। कुल वोटर टर्नआउट करीब 55% रहा, जो ग्रामीण असंतोष को इंगित करता है।

1990: राम नरेश सिंह ने स्वतंत्र के तौर पर फिर बाजी मारी। उन्हें कुल 69,721 वोट मिले और मार्जिन 20,721 वोट थे। जनता दल (JD) के सरवन कुमार उर्फ श्रवण कुमार (तब युवा नेता) दूसरे स्थान पर रहे। अन्य में इंडियन पीपुल्स फ्रंट (IPF) के राजेंद्र पटेल (9,087 वोट) प्रमुख थे। यह जीत मंडल आंदोलन के दौर की जातिगत ध्रुवीकरण को दिखाती है, जहां यादव-कोइरी वोटबैंक ने स्वतंत्रों को मजबूत किया।

इस दौर में जीत का औसत मार्जिन 9-10 हजार वोटों का रहा। लेकिन वोट शेयर 40-50% के आसपास थे। कांग्रेस दो बार जीती थी, लेकिन स्वतंत्र उम्मीदवारों की पकड़ मजबूत रही। कुल 14 उम्मीदवार प्रति चुनाव औसतन लड़े, जो राजनीतिक अस्थिरता का संकेत है।

सरवन कुमार उर्फ श्रवण कुमार का उदय: स्थिरता का दौर (1995-2020)

1995 से नालंदा श्रवण कुमार का ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ बन गया। समाजवादी पार्टी (SAP) से शुरू होकर जनता दल (यूनाइटेड) JD(U) तक उन्होंने सात लगातार जीत हासिल कीं। 2005 में हुए दो चुनाव (फरवरी और अक्टूबर) में उनकी जीत हुई। यह दौर नीतीश कुमार के उदय से जुड़ा, जहां विकास और जातिगत संतुलन ने JD(U) को मजबूत बनाया।

1995: श्रवण कुमार (SAP) ने 47,488 वोटों से धमाल मचाया। उनके मार्जिन 22,863 वोट रहे। जनता दल के जगदीश प्रसाद दूसरे रहे। अन्य में स्वतंत्र सरजुग पासवान (9,804 वोट) मिले। इस चुनाव में कुल वोट शेयर 51% रहे।

2000: फिर श्रवण कुमार समता पार्टी (SAP) विजयी हुए। उन्हें कुल वोट 55,940 वोट मिले और मार्जिन 14,442 वोट रहे। स्वतंत्र प्रत्याशी राम नरेश सिंह दूसरे 33,219 वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहे। अन्य राजद के जगदीश प्रसाद को 33,219 वोट मिले। कुल वोट शेयर वोट शेयर 39% रहे।

2005 (फरवरी): श्रवण कुमार JD(U) 33,115 वोट पाकर जीत दर्ज की। मार्जिन 6,070 वोट रहे। ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक AIFB(S) के राम नरेश दूसरे स्थान पर रहे। अन्य INC के अनिल कुमार को 3,048 वोट मिले।

2005 (अक्टूबर): सरवन कुमार उर्फ श्रवण JD(U)—37,806 वोट, मार्जिन 4,050 वोट। AIFB के राम नरेश दूसरे। अन्य में BSP के विजय कुमार को 2,312 वोट मिले।

2010: श्रवण कुमार JD(U) 58,067 (49.78%) वोट लाकर जीत दर्ज की। उनके मार्जिन 21,037 वोट रहे। RJD के अरुण कुमार दूसरे (37,030 वोट) रहे। अन्य स्वतंत्र प्रत्याशी जगदीश प्रसाद को 7,433 वोट मिले। कुल वोट शेयर 58% रहे।

2015: सबसे कांटे की टक्करः सरवन कुमार उर्फ श्रवण JD(U) 72,596 वोट (44.78% पाकर सिर्फ 2,996 मार्जिन वोट से जीत दर्ज की। दूसरे स्थान पर BJP के कौशलेंद्र कुमार ने 69,600 वोट (42.93%) हासिल की। अन्य स्वतंत्र स्वतंत्र प्रत्याशी अरुणेश कुमार यादव को 3,558 वोट मिले। 6,531 वोट NOTA के तहत दबाए गए। इस चुनाव में वोट शेयर 57.25% रेह। यह जीत NDA गठबंधन के टूटने के बाद आई।

2020: श्रवण कुमार JD(U) ने 66,066 वोट (38.97%) लाकर मार्जिन 16,077 वोट से विजयी हुए। जंतांत्रिक विकास पार्टी (JTVP) के कौशलेंद्र कुमार (पूर्व भाजपा प्रत्याशी) को 49,989 वोट मिले। अन्य INC की गुंजन पटेल को 17,293 वोट मिले। वहीं LJP के राम केशवर प्रसाद तो 10,951 वोट मिले। कुल 54.68% शेयर रहे।

जाहिर है कि श्रवण कुमार का वोट शेयर औसतन 45% रहा, लेकिन मार्जिन घटता गया। 1995 के 22,000 से 2015 के 3,000 तक। JD(U)+ ने 7 चुनाव जीते, जबकि वर्तमान में महागठबंधन (INC) प्रत्याशी कौशलेंद्र कुमार लगातार रनर-अप (2015-2020) रहे हैं। कुल उम्मीदवारों की संख्या 2010 के बाद 20+ हो गई, जो वोट बंटवारे को बढ़ावा देती है।

अब 2025 में श्रवण कुमार JD(U) फिर मैदान में हैं, लेकिन विपक्ष ने कमर कस ली है। कांग्रेस से कौशलेंद्र कुमार की उम्मीदवारी और जन सुराज पार्टी की पूनम सिन्हा नई हवा ला सकती हैं या फिर 2015 जैसी संकरी जीत दोहराई जा सकती है। टर्नआउट अगर 55% से ऊपर रहा तो युवा मतदाता (18-25 आयु वर्ग) फैसला करेंगे। जोकि कुछ अलग संकेत देती है।

(सभी आंकड़े चुनाव आयोग और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित)।

 

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