नालंदा विश्वविद्यालय ने रचा इतिहास, बना देश का पहला ‘नेट जीरो’ यूनिवर्सिटी
नालंदा विश्वविद्यालय का यह नेट जीरो मॉडल सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह शिक्षा और पर्यावरणीय चेतना के संगम का जीवंत उदाहरण भी है...

नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार की ऐतिहासिक धरती नालंदा एक बार फिर देश-दुनिया को राह दिखा रही है। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नालंदा विश्वविद्यालय ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम करते हुए खुद को देश का पहला ‘नेट जीरो विश्वविद्यालय परिसर’ घोषित किया है। यह उपलब्धि न केवल शिक्षा जगत के लिए, बल्कि सतत विकास की दिशा में पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
नेट जीरो का अर्थ है परिसर जितनी ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करता है, उतनी ही मात्रा में वह स्वयं उनका उत्पादन या संतुलन भी कर लेता है। यानी पर्यावरण पर शून्य प्रभाव। नालंदा विश्वविद्यालय के इस मॉडल में कार्बन उत्सर्जन को उतने ही प्रभावी उपायों से कम या संतुलित किया जाता है, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे।
नालंदा विश्वविद्यालय का पूरा परिसर पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। भवनों का निर्माण इस तरह किया गया है कि प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन का अधिकतम उपयोग हो सके। इससे न केवल ऊर्जा की खपत कम होती है, बल्कि छात्रों और शिक्षकों के लिए एक स्वस्थ और अनुकूल वातावरण भी बनता है।
परिसर में सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्ष उपकरण, जल संरक्षण प्रणाली, हरित क्षेत्र और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का व्यापक उपयोग किया गया है। यही वजह है कि विश्वविद्यालय अपनी जरूरत की ऊर्जा खुद पैदा करने में सक्षम है।
नालंदा विश्वविद्यालय का यह नेट जीरो मॉडल सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह शिक्षा और पर्यावरणीय चेतना के संगम का जीवंत उदाहरण भी है। यहां पढ़ने वाले छात्र न केवल अकादमिक ज्ञान अर्जित करते हैं, बल्कि व्यवहारिक रूप से सतत जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को भी समझते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नालंदा विश्वविद्यालय का यह नेट जीरो मॉडल आने वाले समय में देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों, शहरी योजनाओं और ग्रामीण विकास परियोजनाओं के लिए एक आदर्श बन सकता है। बदलते जलवायु संकट के दौर में इस तरह की पहल भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में बेहद अहम मानी जा रही है।
बहरहाल नालंदा विश्वविद्यालय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्राचीन ज्ञान की धरती आधुनिक समाधान देने में भी अग्रणी भूमिका निभा सकती है। यह उपलब्धि बिहार के लिए गर्व की बात है और पूरे देश के लिए एक सकारात्मक संदेश।





