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शिक्षा विभाग में अब गबन-जमा-मुक्ति का फॉर्मूला तय, निलंबन महज औपचारिकता!

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार के शिक्षा विभाग में वित्तीय अनियमितताओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकारी धन के गबन के आरोपों पर सख्ती का दावा करने वाली व्यवस्था में एक नया फॉर्मूला’ उभरता नजर आ रहा है- गबन करो, पैसे जमा कर दो और तुरंत निलंबन से मुक्त हो जाओ

नालंदा जिले के इस ताजा मामले ने न केवल विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी गहरी चोट पहुंचाई है। क्या यह महज एक कर्मचारी की चूक है या विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो चुकी हैं? आइए, इस मामले की गहराई में उतरें।

मामला नालंदा जिले के शिक्षा विभाग के एक लिपिक फणी मोहन से जुड़ा है। फणी मोहन पर सरकारी राशि के गबन का गंभीर आरोप लगा था। इस अनियमितता की जांच के बाद पटना प्रमंडल के क्षेत्रीय डिप्टी डायरेक्टर ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (आरडीडीई) राज कुमार ने 3 सितंबर 2025 को उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया।

निलंबन आदेश जारी होते ही विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो गई, जो सामान्यतः ऐसे मामलों में लंबी और कठोर होती है। लेकिन घटनाक्रम ने सबको चौंका दिया। निलंबन के महज पांच दिनों बाद यानी 8 सितंबर को फणी मोहन ने पटना कोषागार में चालान के माध्यम से मात्र 1830 रुपये की राशि जमा कर दी। इस चालान की प्रति संलग्न करते हुए उन्होंने आरडीडीई को एक आवेदन सौंपा, जिसमें निलंबन समाप्त करने की गुजारिश की गई।

आश्चर्यजनक रूप से आरडीडीई ने इस आवेदन पर बिना किसी विलंब के कार्रवाई की और फणी मोहन को निलंबन से मुक्त कर दिया। विभागीय दस्तावेजों के मुताबिक, यह फैसला इतनी त्वरितता से लिया गया कि कई सहकर्मी और स्थानीय शिक्षक संगठनों ने इसे ‘अनुचित पक्षपात’ करार दिया है।

सवाल यह उठता है कि जब गबन का आरोप साबित हो चुका था और निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई हो चुकी थी, तो फिर राशि जमा होते ही इतनी जल्दबाजी में मुक्ति क्यों? यदि शुरुआत में ही राशि वसूल ली जाती तो निलंबन की यह औपचारिकता क्यों निभाई गई? यह प्रक्रिया न केवल विभागीय नियमों का उल्लंघन दर्शाती है, बल्कि भ्रष्टाचारियों को प्रोत्साहित करने वाली एक खतरनाक मिसाल भी कायम कर रही है।

स्थानीय स्तर पर इस घटना ने हलचल मचा दी है। शिक्षक संघों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे ‘टांय-टांय फिस’ वाली कार्रवाई का प्रतीक बताया है। एक वरिष्ठ शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि सरकारी राशि गबन करो, फिर जमा कर दो और बस, सब माफ! यह नई परंपरा शिक्षा विभाग को और भी भ्रष्ट बना रही है।

लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि अब तो गबन के बाद ‘जमा करो और मुक्त हो जाओ’ का फॉर्मूला अपनाना आसान हो गया है। लेकिन यह मामला केवल फणी मोहन तक सीमित नहीं है। आरडीडीई राज कुमार पर भी सवालों का घेरा कसता जा रहा है।

बताया जाता है कि जब राज कुमार नालंदा के डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर (डीईओ) थे, तब उनके खिलाफ बेंच-डेस्क आपूर्ति में वित्तीय अनियमितता का आरोप साबित हो चुका था। उस मामले में प्रपत्र-क समिति गठित की गई थी और जांच प्रतिवेदन भी प्रस्तुत हो चुका है, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। क्या यह संयोग है या विभाग में उच्च अधिकारियों को बचाने की साजिश?

नालंदा जिले में शिक्षा विभाग की यह स्थिति चिंताजनक है। पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय अनियमितताओं के दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं। चाहे वह स्कूलों में फंड के दुरुपयोग का हो या आपूर्ति ठेकों में कमीशनबाजी का। लेकिन हर बार जांच तो होती है, कार्रवाई का नामोनिशान नहीं। कर्मचारी स्तर पर फणी मोहन जैसे मामले बढ़ रहे हैं तो अधिकारी स्तर पर भी राज कुमार जैसे उदाहरण कम नहीं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह सिस्टम की कमजोरी को दर्शाता है, जहां त्वरित राहत देकर मामलों को दबा दिया जाता है। बिहार सरकार की ‘शिक्षा क्रांति’ की दावों के बीच ऐसी घटनाएं न केवल विभाग की छवि खराब कर रही हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों- यानी छात्रों और शिक्षकों के हितों को भी ठेस पहुंचा रही हैं।

अब सवाल यह है कि क्या इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होगी? क्या बिहार का शिक्षा विभाग भ्रष्टाचार के इस जाल से बाहर निकल पाएगा, या यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा? समय ही बताएगा।

Nalanda Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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