
बेन (नालंदा दर्पण)। बेन प्रखंड मुख्यालय का तालाब पंकज पोखर दशकों से उपेक्षित है। पिछले कई सालों से सही तरीके से बारिश नहीं होने के कारण यह तालाब सूखा पड़ा है। ग्रामीणों के द्वारा इसकी जीर्णोद्धार की मांगें लगातार की जा रही है। फिर भी यहां के जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक पदाधिकारी कुछ नहीं कर रहे हैं। जबकि सरकार द्वारा जल संरक्षण की बातें कही जाती है।

सिंचाई संकट और पशु-पक्षियों पर असर
कभी इस तालाब के पानी से क्षेत्र के सैंकड़ों बीघा भूमि में हरियाली छाई रहती थी। लेकिन लंबे समय से इसका जीर्णोद्धार नहीं होने की वजह से यह तालाब में झाड़ी व घास उग गया है।
इस तालाब में पानी नहीं होने से सिंचाई व्यवस्था चरमराने के साथ हीं पशु-पक्षियों की भी प्यास नहीं बुझ पा रहा है। इतना हीं नहीं गर्मी के दिनों में तो किसानों व मवेशी पालकों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
150 वर्ष पुराना ऐतिहासिक तालाब

कई ग्रामीणों ने बताया कि यह तालाब करीब 150 वर्ष पुराना है। इस तालाब के पानी से खेतों की सिंचाई होती थी। लेकिन तालाब में जलसंचयन नहीं होने से तालाब दशकों से सूखा पड़ा है।
ग्रामीणों ने कहा कि अगर इस ऐतिहासिक तालाब को पर्यटन के दृष्टि से नया और सुंदर बना दिया जाए तो यहां के लोगों के लिए यह काफी लाभदायक होगा। कुछ ग्रामीणों ने बताया कि एक दशक पूर्व मनरेगा से इस तालाब की खुदाई की गई। जो नाकाफी साबित हुई। और यह तालाब उपेक्षित हीं रह गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि इतना बड़ा तालाब आसपास के गांवों व प्रखंडों में भी कहीं नहीं है।
32 से सिमटकर 20 एकड़ में रह गया तालाब

ग्रामीणों की मानें तो यह तालाब करीब 32 एकड़ से अधिक में फैला था, जो अब 20 एकड़ में फैला रह गया है। तालाब के कुछ हिस्से की जमीन पर थाना भवन, प्रखंड सह अंचल भवन, अस्पताल भवन, पंचायत सरकार भवन, सूर्य मंदिर सहित अन्य सरकारी भवन बन जाने से इसका दायरा सिमटता जा रहा है।
तालाब का अस्तित्व को बचाने के लिए जीर्णोद्धार की जरूरत है। जिससे खेतों में हरियाली लौटने के साथ हीं मछली पालन को बढ़ावा दिया जा सके। और तालाब का अस्तित्व भी बचा रहे।
गांव की समृद्धि के प्रतीक थे तालाब

तालाब व पोखर गांव की समृद्धि के द्योतक होते थे। लेकिन सामाजिक व प्रशासनिक उपेक्षा के कारण आज गांवों के पोखर व तालाब इस तरह गायब हो रहे हैं कि वहां इसके निशान भी नहीं मिल रहे हैं।
सरकारी उपेक्षा इस कदर है कि तालाब व पोखर के आंकड़े भी सही नहीं रह गया है। जो प्रशासनिक विफलता का सूचक है। देखरेख व संरक्षण के अभाव में तालाबों की दशा काफी चिंताजनक बनी गया है।
जीर्णोद्धार योजनाएं कागजों तक सीमित

पुराने तालाबों को जीर्णोद्धार करने की योजना जमीनी स्तर पर नहीं हो पा रही है। शासन में बैठे लोगों के पास समय नहीं की देख सकें। जिसके कारण भी तालाब व पोखर अपनी पहचान खो रहे हैं।
ग्रामीणों की मानें तो तीन दशक पूर्व इस तालाब के पानी में आसपास के गांव के लोग भी स्नान करते थे। तालाब में पशु-पक्षी सहित अन्य जीव-जंतु तालाब की पानी से अपनी प्यास बुझाते थे। जो अब नहीं है।
यही नहीं दूर-दूर से अलग-अलग प्रजाति के पक्षियों का झुंड आकर तालाब की शोभा बढ़ाते थे। पक्षियों के कलरव से फिजा गुंजायमान हुआ करता था। पर अब यह सब नजरों से ओझल हो गया है।

ग्रामीणों ने कहा कि तालाब की खुदाई हो जाती तो हमारे गांव का विकास होता। पटवन में सुविधा होती। लेकिन इसके विकास के लिए सरकार की तरफ से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इसको नया बनाने की जरूरत है। अगर खुदाई होगी तो जल का संचय होगा, जलस्तर भी बढ़ेगा और सिंचाई में भी मदद मिलेगी।
प्रशासन ने जताई असमर्थता
बेन प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री हर्ष का कहना है कि तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए कोई योजना नहीं है।
(बेन से नालंदा दर्पण के लिए पत्रकार रामावतार की रिपोर्ट)





