
पावापुरी (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के पावापुरी में स्थित ऐतिहासिक जल मंदिर ने एक बार फिर जैन धर्म के अनुयायियों को भक्ति और श्रद्धा के अनुपम दृश्य से अभिभूत कर दिया। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण उत्सव के अवसर पर यहां आयोजित भव्य समारोह में 51 किलो वजनी ‘महापरिनिर्वाण लाडू’ की बोली साढ़े पांच लाख रुपये लगी।
राजस्थान के सुमेर बढ़जातिया ने इस स्वर्ण लाडू को चढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त कर इतिहास रच दिया। यह घटना न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक है, बल्कि जैन परंपरा की प्राचीनता और आध्यात्मिक गहराई को भी उजागर करती है।
प्रातःकाल होते ही पावापुरी के जल मंदिर प्रांगण में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सैकड़ों दिगंबर जैन अनुयायी पीत वस्त्र धारण कर भगवान महावीर का पंचामृत से अभिषेक करने पहुंचे। दिगंबर जैन मंदिर से भगवान की दिव्य प्रतिमा को सुसज्जित रथ पर विराजमान किया गया। गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़े, ध्वज-पताकाओं और भक्ति भजनों की धुन पर निकाली गई भव्य शोभायात्रा ने पूरे पावापुरी को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
शोभायात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर के समक्ष विशेष लाडू चढ़ाए और रात्रि भर निर्वाण जाप में लीन रहे। मंदिर परिसर में मंत्रोच्चारण, घंटियों की मधुर ध्वनि और भक्ति गीतों का संगम ऐसा था, मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। अहले सुबह पांच बजे जब सूर्य की पहली किरणें जल मंदिर की लालिमा को छू रही थीं, तब दिगंबर धर्मालंबियों ने भगवान महावीर की अग्नि संस्कार भूमि पर 51 किलो का महापरिनिर्वाण लाडू अर्पित किया।
दिगंबर जैन परंपरा में निर्वाण उत्सव पर स्वर्ण, रजत और रत्नों से युक्त लाडू चढ़ाने की प्राचीन प्रथा चली आ रही है। इस बार की नीलामी में पूरे देश से आए श्रद्धालुओं के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। अंततः राजस्थान के प्रसिद्ध जैन उद्योगपति सुमेर बढ़जातिया ने साढ़े पांच लाख रुपये की बोली लगाकर यह सौभाग्य प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि यह लाडू चढ़ाना मेरे जीवन का सबसे बड़ा पुण्य कार्य है। भगवान महावीर की कृपा से हम सब अहिंसा के मार्ग पर चलें।
लाडू को चढ़ाने से पहले मंदिर परिसर को रंग-बिरंगे फूलों, चमचमाती रोशनी और हजारों दीपों से सजाया गया था। अखंड ज्योति का प्रज्वलन किया गया, जो दिव्य आभा के साथ देर रात तक जलती रही। श्रद्धालुओं ने लाडू अर्पित कर पूजा-अर्चना की और अहिंसा, सत्य तथा करुणा के महान संदेश को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
जैन धर्म के विद्वानों के अनुसार, यह लाडू केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि आत्मा के अनंत स्वरूप का जीवंत प्रतीक है। लाडू का गोल आकार जीवन चक्र और आत्मा की अमरता को दर्शाता है। न आदि और न अंत, ठीक वैसे ही जैसे आत्मा का न जन्म है न मृत्यु।
लाडू निर्माण में कई चरणों और कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, जो आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए तप, संयम और परीक्षाओं का प्रतीक है। स्वर्ण लाडू मोक्ष की चमक और शुद्धता का प्रतीक है। रजत लाडू करुणा और दया का भाव है। रत्न लाडू ज्ञान और आत्मबोध की बहुमूल्यता है।
जैन आचार्य डॉ. रामेश्वर प्रसाद ने बताया कि यह परंपरा 2500 वर्ष पुरानी है। भगवान महावीर के निर्वाण स्थल पर यह लाडू चढ़ाना श्रद्धालु को मोक्ष मार्ग पर प्रेरित करता है। 51 किलो का वजन 51 गुणों (जैन तत्त्वों) का प्रतीक है।
इस निर्वाण उत्सव ने पावापुरी को पर्यटन का केंद्र बना दिया। हजारों श्रद्धालु नालंदा, राजगीर और पटना से पहुंचे। स्थानीय प्रशासन ने यातायात और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। श्रद्धालु रीना जैन ने भावुक होकर कहा कि यह दृश्य जीवन भर याद रहेगा। भगवान महावीर का संदेश आज के कलयुग में और प्रासंगिक है।
बता दें कि पावापुरी का यह निर्वाण उत्सव साबित करता है कि जैन धर्म की परंपराएं आज भी जीवंत हैं। 5.5 लाख की बोली वाला महापरिनिर्वाण लाडू न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज को अहिंसा और संयम की याद दिलाता है।





