हिलसा (नालंदा दर्पण)। नगर परिषद हिलसा क्षेत्र में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री आवास योजना (PM Housing Scheme) के तहत लाभुक से 30 हजार रुपये की कथित मांग का मामला अब प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन गया है।
वायरल वीडियो के आधार पर गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में वार्ड पार्षद पर लगे आरोपों को प्रथमदृष्टया सही पाया है और नियमानुसार कार्रवाई की अनुशंसा भी की है। लेकिन रिपोर्ट जिला पदाधिकारी को सौंपे जाने के तीन सप्ताह से अधिक समय बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यही वह बिंदु है, जहां से प्रशासन की उदासीनता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
जांच में क्या-क्या सामने आया? जिला प्रशासन के निर्देश पर गठित समिति ने आवेदिका और उनके पति से विस्तृत पूछताछ की। वायरल वीडियो की तकनीकी व तथ्यात्मक जांच की। संबंधित फाइलों और भुगतान अभिलेखों का मिलान किया। निर्माण स्थल का भौतिक निरीक्षण किया।
जांच के दौरान यह पुष्टि हुई कि योजना की पहली किस्त जारी होने के बाद लाभुक से 30 हजार रुपये की मांग की गई थी। रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया सत्य पाए गए हैं। समिति ने संबंधित वार्ड पार्षद के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की अनुशंसा की है।
कार्रवाई क्यों अटकी? रिपोर्ट जिला पदाधिकारी को भेजे जाने के बाद 3 सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है। प्रशासनिक हलकों में फाइल प्रक्रिया में होने की बात कही जा रही है, लेकिन कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ।
इस संबंध में कार्यपालक पदाधिकारी रविशंकर प्रसाद ने बताया कि जांच टीम ने निष्पक्ष जांच कर प्रतिवेदन जिला अधिकारी को भेज दिया है और आदेश मिलने पर अग्रेतर कार्रवाई की जाएगी।
प्रश्न यह है कि जब जांच में आरोप पुष्ट हो चुके हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों? क्या यह महज प्रक्रियागत विलंब है या स्थानीय राजनीतिक दबाव का परिणाम?
योजना की साख पर असरः प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को पक्का घर उपलब्ध कराना है। हिलसा जैसे अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यह योजना हजारों परिवारों के लिए आशा की किरण है।
यदि लाभुकों से कट मनी या अवैध वसूली की मांग होती है और उस पर कार्रवाई में ढिलाई बरती जाती है तो इससे न केवल योजना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लगता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इस मामले में उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में ऐसे मामलों को बढ़ावा मिलेगा। कुछ सामाजिक संगठनों ने भी पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की है।
क्या कहते हैं जानकार? प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी योजनाओं में शिकायतों के निस्तारण के लिए स्पष्ट समय सीमा तय होनी चाहिए। जांच रिपोर्ट आने के बाद लंबित कार्रवाई न केवल पीड़ित पक्ष का मनोबल तोड़ती है, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शासन की जीरो टॉलरेंस नीति पर भी सवाल खड़े करती है।
आगे क्या? अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या जांच समिति की अनुशंसा पर अमल होगा? क्या दोषी पाए गए जनप्रतिनिधि के खिलाफ विभागीय या दंडात्मक कार्रवाई होगी?
हिलसा की जनता यह जानना चाहती है कि क्या गरीबों के हक की रक्षा कागजों तक सीमित रहेगी या वास्तव में जवाबदेही तय होगी। जब जांच ने सच उजागर कर दिया है, तब प्रशासन की चुप्पी ही सबसे बड़ा सवाल बन गई है। स्रोतः हिलसा रिपोर्टर/नालंदा दर्पण

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