राजगीर (नालंदा दर्पण)। ऐतिहासिक और पर्यटन नगरी राजगीर उस समय दहशत और अफरा-तफरी के माहौल में घिर गई, जब अजातशत्रु किला मैदान में अचानक भीषण आग लग गई। शुरुआत में मामूली दिखने वाली यह आग कुछ ही मिनटों में विकराल रूप धारण कर गई और देखते ही देखते करीब तीन एकड़ से अधिक क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया।
मैदान में फैली सूखी झाड़ियां, घास और झुरमुट तेजी से जलने लगे, जिससे आग की लपटें कई फीट ऊंची उठने लगीं और दूर-दूर तक धुएं का गुबार फैल गया। आसपास मौजूद लोगों में भय का माहौल बन गया और स्थिति को देखते हुए स्थानीय लोगों ने तत्काल अग्निशमन विभाग को सूचना दी।
घटना की सूचना मिलते ही अनुमंडल अग्निशमन पदाधिकारी ज्योति कुमारी के नेतृत्व में दमकल की तीन गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, लेकिन यहां सबसे बड़ी बाधा बनी किला मैदान में समुचित प्रवेश मार्ग का अभाव।
दमकल वाहनों के लिए कोई सीधा रास्ता उपलब्ध नहीं होने के कारण फायर ब्रिगेड कर्मियों को दीवार और लोहे के ग्रिल फांदकर मैदान के अंदर प्रवेश करना पड़ा। इस दौरान भारी उपकरणों के साथ अंदर पहुंचना बेहद कठिन साबित हुआ, जिससे आग बुझाने की प्रक्रिया में शुरुआती देरी भी हुई।
गाड़ियां घटनास्थल तक नहीं पहुंच सकीं, इसलिए लंबी पाइपलाइन के सहारे पानी डालकर आग बुझाने का प्रयास किया गया, लेकिन तेज पछुआ हवा के कारण आग बार-बार नए क्षेत्रों में भड़कती रही और हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बने रहे।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग किला मैदान के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से से शुरू हुई थी, जहां सूखी घास और झाड़ियां अधिक मात्रा में मौजूद थीं। गर्मी और सूखे मौसम के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक ज्वलनशील हो गया था। जैसे ही आग लगी, पछुआ हवा ने उसे तेजी से पूरे मैदान में फैला दिया।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कुछ ही समय में मैदान का आधे से अधिक हिस्सा आग की चपेट में आ गया और लपटें वेणुवन की उत्तरी दीवार तक पहुंच गईं। इससे आसपास के इलाके में और अधिक चिंता फैल गई, क्योंकि यदि आग वेणुवन परिसर में प्रवेश कर जाती, तो वहां के पेड़-पौधों और जैव विविधता को भारी नुकसान हो सकता था।
हालात की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग की टीम भी तत्काल सक्रिय हो गई। फॉरेस्टर अमोद कुमार, वनरक्षी देव कुमार और फॉरेस्ट गार्ड सूर्यकांत के नेतृत्व में दर्जनों कर्मियों ने मोर्चा संभाला और वेणुवन परिसर से मोटर चलाकर पानी की बौछार शुरू की।
इस दौरान स्थानीय लोग भी पीछे नहीं रहे और हरे पेड़ों की डालियों के सहारे आग को दबाने और फैलने से रोकने का प्रयास करते नजर आए। प्रशासन, वन विभाग और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयास से आग को नियंत्रित करने की कोशिश लगातार जारी रही, हालांकि तेज हवा के कारण आग पूरी तरह काबू में लाना बेहद चुनौतीपूर्ण बना रहा।
समाचार लिखे जाने तक दमकल और वन विभाग की टीम आग पर काबू पाने के लिए लगातार प्रयासरत थी। आग लगने के कारणों का अब तक स्पष्ट खुलासा नहीं हो सका है, लेकिन प्रारंभिक तौर पर भीषण गर्मी, सूखी घास और लापरवाही को संभावित कारण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्रों में नियमित सफाई और निगरानी नहीं होने से इस तरह की घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है।
यह घटना एक बार फिर प्रशासनिक तैयारियों और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अजातशत्रु किला मैदान जैसे महत्वपूर्ण स्थल पर अगर दमकल गाड़ियों के प्रवेश के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है तो यह एक बड़ी चूक मानी जाएगी। आपातकालीन स्थिति में त्वरित कार्रवाई के लिए उचित मार्ग, जल स्रोत और फायर सेफ्टी सिस्टम का होना बेहद आवश्यक है, जिसकी कमी इस घटना में स्पष्ट रूप से देखने को मिली।
गनीमत रही कि इस अग्निकांड में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन इसने एक बड़ी चेतावनी जरूर दे दी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं, जिससे न केवल पर्यावरण और ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि पर्यटन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस घटना से सबक लेकर सुरक्षा व्यवस्था को कितना मजबूत करता है।


