राजगीर मलमास मेला 2026: पवित्र कुंडों के संरक्षण की पुकार
राजगीर मलमास मेला की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। यह मेला न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का विषय है। पवित्र कुंडों का संरक्षण और मेले की भव्य तैयारी न केवल श्रद्धालुओं की आस्था को बनाए रखेगी, बल्कि राजगीर को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती प्रदान करेगी। समय रहते उचित कदम उठाकर हम इस धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव को और अधिक गरिमामय बना सकते हैं..

राजगीर (नालंदा दर्पण)। बिहार के ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी राजगीर में आयोजित होने वाला राजकीय मलमास मेला 2026 में 17 मई से 15 जून तक अपने पूरे वैभव के साथ शुरू होगा। ढाई से तीन वर्षों में एक बार लगने वाला यह मेला धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व का अनूठा संगम है।
मान्यता है कि इस अवधि में 33 कोटि देवी-देवता राजगीर में प्रवास करते हैं, जिसके कारण यह मेला देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं, तीर्थयात्रियों, संत-महात्माओं, पर्यटकों और साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है।
बता दें कि राजगीर अपने 22 पवित्र कुंडों और 52 धाराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इन कुंडों का जल न केवल शारीरिक शुद्धि प्रदान करता है, बल्कि मानसिक और आत्मिक शांति का भी स्रोत माना जाता है।
मलमास मेला के दौरान श्रद्धालु इन कुंडों और नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह मेला न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी प्रदर्शित करता है।
हालांकि इस मेले की गरिमा और आकर्षण को बनाए रखने के लिए राजगीर के पवित्र कुंडों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। दुख की बात है कि कई महत्वपूर्ण कुंड जैसे- दुखहरणी कुंड, अग्निधारा कुंड, गोदावरी कुंड और शालिग्राम कुंड अत्यधिक उपेक्षा के कारण या तो जमींदोज हो चुके हैं या अपनी मूल पहचान खो चुके हैं।
शालिग्राम कुंड अब एक नाले में तब्दील हो गया है, जबकि भरत कूप जंगल-झाड़ियों से ढक गया है। सरस्वती नदी जैसे जलस्रोत भी अपनी पवित्रता और स्वरूप को खोते जा रहे हैं।
मलमास मेला शुरू होने में अब एक वर्ष से भी कम समय बचा है। ऐसे में, राज्य सरकार, जिला प्रशासन और नगर परिषद को समन्वय के साथ तत्काल कार्रवाई शुरू करनी होगी। कुंडों की व्यापक सफाई, गाद निकासी, जलस्रोतों का पुनर्जनन और जमींदोज कुंडों का पुनर्निर्माण जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यदि समय रहते इनका जीर्णोद्धार नहीं किया गया, तो यह न केवल श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट पहुंचाएगा, बल्कि मेले की वैश्विक गरिमा और पर्यटन की संभावनाओं को भी नुकसान होगा।
लोगों की मांग है कि विशेषज्ञों की एक टीम गठित कर जमींदोज कुंडों का सर्वेक्षण किया जाए और उनके पुनर्निर्माण की योजना बनाई जाए। कुंडों और नदियों में जल की निरंतरता बनाए रखने के लिए जलस्रोतों का पुनर्जनन और संरक्षण किया जाए।
मेले से पहले और इसके दौरान कुंडों और आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान चलाया जाए। श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिए बेहतर आवास, परिवहन और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। स्थानीय समुदाय और तीर्थयात्रियों को कुंडों के महत्व और उनके संरक्षण के लिए जागरूक किया जाए।





