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जैन भक्ति में डूबा राजगीर: नौलखा मंदिर के 65वें स्थापना दिवस पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

Rajgir Jain Shwetambar Kothi Naulakha Temple 65th Foundation Day Celebration
राजगीर जैन श्वेतांबर कोठी नौलखा मंदिर 65वां स्थापना दिवस समारोह

राजगीर (नालंदा दर्पण)। प्राचीन इतिहास, आध्यात्मिक विरासत और धार्मिक आस्था के अद्वितीय संगम के रूप में प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन नगरी राजगीर एक बार फिर जैन भक्ति में सराबोर हो उठा। यहाँ स्थित नौलखा मंदिर राजगीर में 20वें जैन तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत स्वामी को समर्पित 65वां स्थापना दिवस समारोह तीन दिनों तक श्रद्धा, उल्लास और धार्मिक उत्साह के साथ मनाया गया।

इस अवसर पर बिहार ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों जैन श्रद्धालु राजगीर पहुंचे। मंदिर परिसर में आयोजित पूजा-अर्चना, भव्य शोभायात्रा, ध्वजारोहण और भक्ति संध्या ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

समारोह का मुख्य आकर्षण मंदिर के शिखर पर विधि-विधान के साथ ध्वजारोहण रहा, जो पिछले 65 वर्षों से लगातार निभाई जा रही परंपरा का प्रतीक है।

आस्था और उत्सव का संगम बना राजगीरः तीन दिवसीय इस समारोह की शुरुआत मंगलाचरण और पूजा से हुई। अंतिम दिन प्रातःकाल मंदिर परिसर से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जो राजगीर के प्रमुख मार्गों से होते हुए पटेल चौक तक पहुंची और पुनः मंदिर परिसर में समाप्त हुई।

शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालु भगवान के जयकारे लगाते, भक्ति गीतों पर झूमते और पारंपरिक जैन ध्वज लेकर आगे बढ़ते दिखाई दिए। ढोल-नगाड़ों और धार्मिक गीतों की ध्वनि से पूरा नगर भक्तिमय हो उठा।

मंदिर परिसर में जैन परंपरा के अनुसार सत्रहभेदी पूजा और नवमी पूजा का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

65 वर्षों से निभाई जा रही ध्वजारोहण की परंपराः नौलखा मंदिर के स्थापना दिवस समारोह की सबसे विशेष परंपरा मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाने की है। कोलकाता के प्रसिद्ध रामपुरिया परिवार पिछले 65 वर्षों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। इस वर्ष भी परिवार की ओर से श्रद्धा-भक्ति के साथ मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाई गई।

परिवार के सदस्य संजय रामपुरिया ने बताया कि उनके पूर्वज बाबू जीवराज जी, नथमल जी, सोहनलाल जी और भीखमचंद जी ने वर्ष 1961 से यह सेवा शुरू की थी और तब से यह परंपरा निरंतर जारी है।

अरुणा रामपुरिया ने कहा कि राजगीर आकर भगवान की सेवा करना उनके परिवार के लिए सौभाग्य की बात है।

भक्ति संध्या में गूंजे जैन भजनः समारोह के दौरान भक्ति संध्या का भी आयोजन किया गया, जिसमें मुकेश भाई और कमलेश भाई ने अपने भक्ति गीतों से श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। भजनों के बीच भगवान के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर गूंज उठा। कई श्रद्धालु भक्ति संगीत पर झूमते नजर आए।

जैन धर्म का महत्वपूर्ण तीर्थ है राजगीरः राजगीर का संबंध जैन धर्म से अत्यंत गहरा और प्राचीन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थान भगवान मुनिसुव्रत स्वामी की जन्मभूमि माना जाता है। इसी कारण जैन समुदाय के लिए राजगीर एक पवित्र तीर्थस्थल है।

यहाँ कई जैन मंदिर, तपस्थली और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, जहाँ हर वर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। राजगीर का धार्मिक महत्व केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं है। यह स्थान बौद्ध और हिंदू परंपराओं में भी अत्यंत पवित्र माना जाता है।

क्यों कहा जाता है इसे नौलखा मंदिरः मुनिसुव्रत स्वामी मंदिर को आमतौर पर नौलखा मंदिर कहा जाता है। इसके नाम को लेकर कई लोक मान्यताएँ प्रचलित हैं।

सबसे लोकप्रिय मान्यता यह है कि मंदिर के निर्माण में उस समय करीब नौ लाख रुपये की लागत आई थी। उसी कारण इसका नाम नौलखा मंदिर पड़ गया।

हालाँकि समय के साथ इस मंदिर का विस्तार और सौंदर्यीकरण भी हुआ है, जिससे यह आज राजगीर के प्रमुख जैन तीर्थों में शामिल हो गया है।

अनोखी वास्तुकला: बिना लोहे के बना मंदिरः मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी वास्तुकला है। मंदिर ट्रस्ट के अनुसार इसका निर्माण राजस्थान के कुशल कारीगरों द्वारा पारंपरिक शैली में किया गया था और इसमें कहीं भी लोहे का उपयोग नहीं किया गया है।

पत्थरों की पारंपरिक जोड़ तकनीक के माध्यम से इसे तैयार किया गया है, जो प्राचीन भारतीय वास्तुशिल्प की उत्कृष्टता को दर्शाता है। मंदिर की संरचना में शिखर, गर्भगृह और विशाल प्रांगण है, जहाँ धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

धार्मिक पर्यटन को भी मिलता है बढ़ावाः राजगीर पहले से ही बिहार का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। यहाँ आने वाले पर्यटक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों का दर्शन करते हैं। नौलखा मंदिर भी अब राजगीर के प्रमुख धार्मिक आकर्षणों में शामिल हो चुका है।

यहाँ आयोजित धार्मिक समारोहों के कारण पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है। होटल, स्थानीय बाजार और परिवहन क्षेत्र को भी इससे लाभ मिलता है।

सामाजिक-आध्यात्मिक संदेश भी देता है यह आयोजनः कार्यक्रम में वीरायतन की मुख्य संरक्षिका साध्वी डॉ. सम्प्रज्ञा जी महाराज ने कहा कि मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाने का अवसर अत्यंत पुण्यशाली लोगों को प्राप्त होता है।

उन्होंने जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा, करुणा और “जियो और जीने दो” के संदेश को समाज में फैलाने की आवश्यकता पर बल दिया।

जैन संस्कृति और परंपरा को मिलती है नई ऊर्जाः मंदिर ट्रस्ट के सचिव रंजन कुमार जैन ने बताया कि यह समारोह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जैन संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपने धर्म और संस्कृति से जोड़ने का काम करते हैं।

उन्होंने कहा कि राजगीर की पवित्र भूमि पर हर वर्ष हजारों श्रद्धालु जुटते हैं और यह परंपरा जैन समाज की एकता और आस्था का प्रतीक बन चुकी है।

कभी-कभी चुनौतियाँ भी सामने आती हैः इतने बड़े धार्मिक स्थल होने के कारण मंदिर कभी-कभी विवाद या घटनाओं के कारण भी चर्चा में रहा है।

कुछ समय पहले मंदिर की दान पेटी से जुड़े एक चोरी मामले में पुलिस ने पुजारी के परिजनों सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया था और लाखों रुपये बरामद किए थे।

हालाँकि मंदिर ट्रस्ट ने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए श्रद्धालुओं के विश्वास को बनाए रखने की दिशा में कदम उठाए हैं।

हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थितिः समारोह में ट्रस्टी राजकुमार जैन, भरत भाई मेहता, रणवीर कुमार जैन, प्रतीक जैन, सुरेश बोथरा, डौली जैन, अर्चना जैन, नमीता जैन, मानसी जैन, प्रेमचंद रामपुरिया, कौशल रामपुरिया, देव रामपुरिया, विमला देवी, सरला देवी, कांता रामपुरिया, कविता, ववीता, आशा बेन, विशि जैन, साहिल जैन, सृष्टि जैन, अनवेश कोठारी, रमेश वसा, गीतम मिश्रा, सुखराज जैन, मनोज अग्रवाल, राकेश, प्रतिक, धीरेन, निकेश भाई पारेख, ज्ञानचंद जैन, कंचन जैन, रूपा जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

राजगीर में भक्ति और परंपरा का जीवंत केंद्रः नौलखा मंदिर का यह स्थापना दिवस समारोह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और परंपराओं का जीवंत उत्सव है।

राजगीर की पवित्र भूमि पर हर वर्ष होने वाला यह आयोजन जैन समाज की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक एकता और आध्यात्मिक परंपराओं को नई ऊर्जा प्रदान करता है।

भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिकता का यह संगम आने वाले वर्षों में भी राजगीर को जैन श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में स्थापित करता रहेगा। समाचार स्रोतः नालंदा दर्पण/मीडिया रिपोर्टस्

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