बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहारशरीफ नगर से सटे पश्चिम स्थित क्षेत्र में प्रसिद्ध मघड़ा शीतलाष्टमी मेला एक बार फिर आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बनकर शुरू हो गया है। प्राचीन सिद्धपीठ मानी जाने वाली मां शीतला के दरबार में तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेले के भव्य आगाज के साथ ही हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है।
चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर लगने वाला यह मेला नालंदा ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों के लोगों के लिए गहरी धार्मिक आस्था का केंद्र माना जाता है।
सप्तमी तिथि के अवसर पर मघड़ा सहित आसपास के दर्जनों गांवों में पारंपरिक बसियौड़ा प्रसाद तैयार किया गया। इस विशेष परंपरा के तहत श्रद्धालु एक दिन पहले ही भोजन पकाते हैं, जिसे अगले दिन शीतला अष्टमी के अवसर पर माता को अर्पित किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार बुधवार को शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला की मूर्ति को दही और चीनी से स्नान कराने के बाद बासी प्रसाद चढ़ाया जाएगा और श्रद्धालु उसी प्रसाद को ग्रहण करेंगे। इस दिन आसपास के गांवों में चूल्हे नहीं जलाने की परंपरा भी पीढ़ियों से निभाई जाती रही है।
बसियौड़ा के अवसर पर श्रद्धालुओं ने माता शीतला के लिए अरवा चावल की भात, चने की दाल, पुआ-पूरी, सब्जी, लाल साग आदि पारंपरिक व्यंजन बनाए। इसके साथ ही प्राचीन मीठी कुआं पर पूजा-अर्चना की गई।
मंदिर परिसर के निकट स्थित तालाब में स्नान करने के बाद श्रद्धालुओं ने परिवार सहित माता के दर्शन किए। मंगलवार से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया है, जबकि बुधवार को शीतला अष्टमी के दिन यहां सबसे अधिक भीड़ होने की संभावना जताई जा रही है।
आस्था से जुड़ी ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताएं: मघड़ा स्थित शीतला माता मंदिर की प्राचीनता को लेकर कई ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ भी प्रचलित हैं। मंदिर के पंडा कमेटी अध्यक्ष मुन्नालाल पांडेय के अनुसार इस स्थान का उल्लेख प्राचीन चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में भी मिलता है।
माना जाता है कि जब ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययनरत थे, तब वे बड़ी पहाड़ी स्थित पुस्तकालय से विश्वविद्यालय जाते समय इसी क्षेत्र में नीम और पीपल के वृक्षों की छांव में विश्राम किया करते थे।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु द्वारा माता सती के शरीर के खंड किए जाने के बाद भगवान शिव ने उनके अवशेषों को एक ‘मघ’ यानी घड़े में रखकर इस भूमि पर छिपाया था। इसी कारण इस गांव का नाम मघड़ा पड़ा। बाद में राजा वृषकेतु को स्वप्न में माता के दर्शन हुए, जिसके बाद खुदाई के दौरान मां शीतला की प्रतिमा प्राप्त हुई और उसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की गई।
रोग निवारण की आस्था से जुड़ा मंदिरः स्थानीय लोगों की मान्यता है कि मघड़ा का शीतला माता मंदिर चेचक और अन्य चर्म रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता के दरबार का जल और भभूत लगाने से असाध्य चर्म रोगों में भी राहत मिलती है। यही कारण है कि शीतलाष्टमी मेले के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं।
मेले में सजी दुकानों और झूलों की रौनकः तीन दिवसीय मेले को लेकर मघड़ा गांव और आसपास का पूरा इलाका मेले के रंग में रंग गया है। छोटे-छोटे व्यवसायियों ने अस्थायी दुकानों में नाश्ता-पानी, पूजन सामग्री, श्रृंगार, खिलौने और घरेलू सामान की बिक्री शुरू कर दी है। बच्चों और युवाओं के आकर्षण के लिए तरह-तरह के झूले और खेल-तमाशे भी लगाए गए हैं। इन सबके कारण पूरा मेला क्षेत्र गुलजार नजर आ रहा है।
प्रशासन की सख्त निगरानी और सुरक्षा व्यवस्थाः मेले में जुटने वाली भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। जगह-जगह पुलिस बल की तैनाती की गई है और पूरे मेला क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरों के जरिए निगरानी रखी जा रही है।
वार्ड पार्षद प्रतिनिधि जयंत शर्मा के अनुसार इस बार पूरे मेले को तकनीकी निगरानी से लैस किया गया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पर्याप्त लाइटिंग, पेयजल, चलंत शौचालय और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गई है। तालाब में किसी भी अप्रिय घटना से बचाव के लिए एसडीआरएफ की टीम भी तैनात की गई है।
आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का संगमः मघड़ा का शीतलाष्टमी मेला केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह नालंदा की लोकसंस्कृति, सामुदायिक परंपराओं और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। सदियों से चली आ रही बसियौड़ा और बासी प्रसाद की परंपरा आज भी ग्रामीण जीवन की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाती है। यही कारण है कि हर वर्ष यह मेला न केवल श्रद्धालुओं बल्कि शोधकर्ताओं और संस्कृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। स्रोतः नालंदा दर्पण/मीडिया रिपोर्टस्
