
राजगीर (नालंदा दर्पण)। बौद्ध इतिहास और प्राचीन भारतीय सभ्यता की गौरवगाथा अपने भीतर समेटे ऐतिहासिक अजातशत्रु स्तूप आज घोर विभागीय उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।
मगध सम्राट अजातशत्रु की राजधानी रहे राजगीर में स्थित यह स्तूप उनके अस्थि कलश पर निर्मित बताया जाता है, जिसे बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है।
दुर्भाग्यवश इतना महत्वपूर्ण स्मारक आज संरक्षण, पहचान और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अपनी गरिमा खोता जा रहा है।
अजातशत्रु स्तूप के आसपास न तो कोई सूचना बोर्ड लगाया गया है और न ही मार्गदर्शन संकेतक की व्यवस्था है। परिणामस्वरूप देश-विदेश से आने वाले पर्यटक और बौद्ध श्रद्धालु इसके ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व से अनभिज्ञ रह जाते हैं।
कई सैलानी जानकारी के अभाव में इस अमूल्य धरोहर को देखे बिना ही आगे बढ़ जाते हैं, जिससे न केवल इसकी पहचान प्रभावित हो रही है, बल्कि पर्यटन की संभावनाएं भी सिमटती जा रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि संरक्षण के अभाव में स्तूप की गरिमा लगातार धूमिल हो रही है। हालात इतने चिंताजनक हैं कि स्तूप की चहारदीवारी और ग्रिल पर आसपास के लोग कपड़े सुखाते नजर आते हैं। परिसर में कुत्तों का खुलेआम विचरण आम हो गया है, वहीं बकरियां बेखौफ होकर घास चरती दिखाई देती हैं।
यह स्थिति न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करती है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रशासनिक उदासीनता को भी उजागर करती है।
इस उपेक्षा को लेकर स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों में गहरी नाराजगी और निराशा व्याप्त है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के शीर्ष पदाधिकारियों से अजातशत्रु स्तूप के समुचित संरक्षण की मांग की है।
इन लोगों का कहना है कि यदि समय रहते अजातशत्रु स्तूप का संरक्षण, सौंदर्यीकरण, सुरक्षा व्यवस्था और सूचना बोर्ड की व्यवस्था नहीं की गई तो यह अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे नष्ट हो जाएगी।
उन्होंने प्रशासन से अविलंब ठोस और प्रभावी कदम उठाने की अपील की है। ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक विरासत को देख, समझ और उस पर गर्व कर सकें।
अब देखना यह है कि प्रशासन और संबंधित विभाग कब तक इस पुकार को सुनते हैं और मगध की इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए ठोस पहल करते हैं।





