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CM नीतीश के हरनौत का सबसे महंगा सरकारी स्कूल, एक छात्र का मासिक फीस ₹30 हजार!

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह प्रखंड हरनौत में स्थित चिंतामनचक प्राइमरी स्कूल एक ऐसी कहानी बयां कर रहा है, जो राज्य की ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कल्पना कीजिए: मात्र पांच छात्रों के लिए चार शिक्षक तैनात हैं और सरकार हर महीने इन पर 1.48 लाख रुपये खर्च कर रही है!

The reality of education is exposed in CM Nitish's Harnaut, ₹30 thousand is spent on a student every month
The reality of education is exposed in CM Nitish’s Harnaut, ₹30 thousand is spent on a student every month

यानी प्रति छात्र करीब 30,000 रुपये का मासिक व्यय। यह न केवल संसाधनों की बर्बादी का जीता-जागता उदाहरण है, बल्कि नालंदा जिले में व्याप्त असमानता को भी उजागर करता है। क्या यह स्कूल ग्रामीण शिक्षा की बदहाली का प्रतीक बन चुका है या फिर सुधार की दिशा में एक जागृति का संकेत?

स्कूल की स्थापना वर्ष 2007 में हुई थी, लेकिन पिछले 18 वर्षों में छात्र संख्या में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई। प्रधान शिक्षिका पुष्पांजलि कुमारी बताती हैं, “वर्तमान में कक्षा 1, 3 और 5 में एक-एक छात्र हैं, जबकि कक्षा 4 में दो छात्र नामांकित हैं। कक्षा 2 में तो एक भी बच्चा नहीं है। पिछले साल 9 बच्चों का नामांकन था, लेकिन संख्या लगातार घट रही है।” यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इतने संसाधनों के बावजूद स्कूल क्यों खाली पड़ा है?

इस कम नामांकन के पीछे गांव की जनसांख्यिकी एक बड़ा कारण है। चिंतामनचक एक छोटा सा गांव है, जहां अधिकांश परिवार रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों जैसे दिल्ली, पंजाब या गुजरात में पलायन कर चुके हैं। उसमें भी प्रायः बच्चे प्राइवेट स्कूल का रुख कर लेते हैं।

स्थानीय निवासी बताते हैं कि पहले यहां जीवंतता थी, लेकिन अब सन्नाटा पसरा है। शिक्षक स्टाफ में पुष्पांजलि कुमारी और रोशन राज (दोनों बीपीएससी से नियुक्त) के अलावा धर्मशीला कुमारी और संगीता देवी (पंचायत शिक्षिकाएं) शामिल हैं। इनकी मासिक तनख्वाहें क्रमशः 45,000 रुपये, 45,000 रुपये, 29,000 रुपये और 29,000 रुपये हैं, जो कुल मिलाकर 1.48 लाख रुपये बनती हैं। सवाल यह है कि क्या इतने खर्च के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित हो पा रही है?

स्कूल की भौतिक स्थिति तो और भी दयनीय है। उमेश चंद्र बिहारी द्वारा दान की गई साढ़े चार कट्ठा जमीन पर बने इस भवन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मानसून के मौसम में परिसर में जलजमाव हो जाता है, जिससे कीचड़ और पानी का साम्राज्य फैल जाता है।

भवन का प्लास्टर बार-बार गिरता है, चारदीवारी जर्जर है और शौचालयों की हालत ऐसी है कि बच्चे इस्तेमाल करने से डरते हैं। कक्षाओं में दरारें पड़ चुकी हैं, जो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। स्वास्थ्य और स्वच्छता की दृष्टि से देखें तो स्थिति और भी खराब है।

रसोइया मंजू देवी बताती हैं कि 2012 से गैस कनेक्शन की मांग कर रही हूं, लेकिन अब तक नहीं मिला। मिड डे मील गोबर के उपलों या लकड़ी पर पकाना पड़ता है। इससे निकलने वाला धुआं बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। कल्पना कीजिए, ऐसे माहौल में बच्चे कैसे पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाते होंगे?

यह स्कूल नालंदा जिले में व्याप्त शिक्षा की असमानता का एक छोटा सा नमूना है। जहां एक ओर बड़े शहरों के स्कूलों में संसाधनों की कमी है, वहीं यहां जैसे छोटे स्कूलों में अतिरिक्त शिक्षक बेकार बैठे हैं। क्या सरकार इस स्थिति पर ध्यान देगी? क्या चिंतामनचक प्राइमरी स्कूल को बंद कर आस-पास के स्कूलों में विलय किया जाएगा या फिर इसे मजबूत बनाने के लिए कदम उठाए जाएंगे?

स्थानीय शिक्षा अधिकारी का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

चिंतामनचक प्राइमरी स्कूल की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि ग्रामीण शिक्षा में केवल पैसा खर्च करना काफी नहीं है। जरूरत है बेहतर प्रबंधन, बुनियादी ढांचे के विकास और पलायन रोकने के उपायों की। क्या यह स्कूल बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक जागृति का कारण बनेगा या फिर यह कहानी भी फाइलों में दफन हो जाएगी? यह समय ही बताएगा।

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