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शराबबंदी का सच: जब नशे में धुत्त युवक ने थाना को बनाया रंगमंच!

The reality of prohibition When a drunk youth turned the police station into a stage!

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार में शराबबंदी की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे ‘लड्डू भी खाना है और वजन भी घटाना है!’ सरकारी आदेशों और पुलिसिया धरपकड़ के बावजूद शराब का अवैध धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। रोज़ न जाने कितने शराबी धराए जाते हैं। लेकिन शराबबंदी की हकीकत को समझने के लिए आपको लहेरी थाना की इस दिलचस्प घटना को जानना होगा।

दरअसल, लहेरी थाना पुलिस ने इसलामपुर निवासी राकेश कुमार को शराब के नशे की हालत में धर दबोचा। नशे में धुत्त राकेश पुलिस को देखकर पहले तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कानून के लंबे-चौड़े प्रवचन देने लगा। लेकिन जब बात नहीं बनी तो वो सीधे ‘राजनीति कार्ड’ खेलते हुए सैल्यूट मारने लगा। उसने खुद को एक बड़ी पार्टी का समर्थक बताते हुए कहा, “आप जानते नहीं, हम कौन हैं!”

थाने में पहुंचते ही उसकी नौटंकी ने नया मोड़ ले लिया। नशे में झूमते हुए उसने थाने को ही अपना मंच बना लिया और पुलिसवालों को ‘जनता का सेवक’ बताते हुए इंसाफ की मांग करने लगा। बात यहीं खत्म नहीं हुई! जब पुलिस ने कागजातों पर उसकी गिरफ्तारी की मुहर लगानी चाही तो राकेश ने उन्हें ऐसे फाड़ डाला जैसे पुरानी किताब की रद्दी हो।

इसके बाद जब पुलिस उसे मेडिकल जांच के लिए सदर अस्पताल ले गई तो वहां उसने डॉक्टरों के सामने ‘हॉलीवुड स्टाइल’ में बेहोश होने का नाटक किया। लेकिन जब डॉक्टर ने “कौन-कौन सी उंगली दिख रही है?” का टेस्ट किया तो राकेश ने जवाब में कहा, “पांचों उंगलियां बराबर होती हैं!”

थक-हारकर पुलिस ने आखिरकार उस पर हंगामा और सरकारी कार्य में बाधा डालने का मामला दर्ज कर दिया और न्यायालय के सुपुर्द कर दिया।

अब सवाल यह है कि जब शराबबंदी के बावजूद शराब हर कोने में मिल रही है, तो इस पर नकेल कसने की असली जिम्मेदारी किसकी है? सरकार की, पुलिस की या उन लोगों की, जो चोरी-छुपे इसे पीकर कानून से आंख-मिचौली खेलते हैं? या फिर यह मान लिया जाए कि शराबबंदी बस एक सरकारी नाटक है और इसके असली पात्र तो हमारे समाज में ही बैठे हैं?

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