थरथरी BDO पर चला RTI का हथौड़ा, लगा 25 हजार का जुर्माना

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। सूचना का अधिकार कानून (RTI) की अनदेखी करना थरथरी प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) को महंगा पड़ गया। बिहार राज्य सूचना आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए बीडीओ पर 25 हजार रुपये का आर्थिक दंड लगाया है और अगली सुनवाई में स्वयं उपस्थित होने का निर्देश दिया है। यह कार्रवाई वर्षों तक सूचना दबाए रखने और आयोग के आदेशों की अवहेलना के मामले में की गई है।
मामला थरथरी प्रखंड अंतर्गत ग्राम मकुंदन बिगहा निवासी राज कुमार सिन्हा द्वारा वर्ष 2019 में दायर आरटीआई आवेदन से जुड़ा है। आवेदन के माध्यम से उन्होंने सरकारी योजनाओं से संबंधित जानकारी मांगी थी, जो प्रखंड समन्वयक कुमारी मिर्जा से संबंधित थी। लेकिन निर्धारित समय सीमा के भीतर न तो पूरी सूचना उपलब्ध कराई गई और न ही उसे सत्यापित रूप में प्रस्तुत किया गया।
लगातार टालमटोल से परेशान होकर आवेदक ने बिहार राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि लोक सूचना पदाधिकारी सह बीडीओ ने न केवल सूचना देने में गंभीर लापरवाही बरती, बल्कि आयोग द्वारा पारित पूर्व आदेशों की भी अवहेलना की। यहां तक कि आयोग द्वारा मांगी गई स्पष्टीकरण रिपोर्ट भी समय पर प्रस्तुत नहीं की गई।
इस गंभीर उदासीनता को देखते हुए राज्य सूचना आयुक्त ब्रजेश मेहरोत्रा ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के तहत तत्कालीन बीडीओ पर अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह लापरवाही जानबूझकर की गई प्रतीत होती है, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आयोग ने यह भी निर्देश दिया है कि संबंधित बीडीओ 25 फरवरी 2026 को पूर्वाह्न 11 बजे आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर मांगी गई पूरी सूचना के साथ अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। आदेश में चेतावनी दी गई है कि यदि अगली सुनवाई में भी संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो उनके विरुद्ध आरटीआई अधिनियम की धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी।
इस आदेश की प्रतिलिपि नालंदा जिलाधिकारी एवं कोषागार पदाधिकारी को भी भेजी गई है। ताकि जुर्माने की राशि की वसूली सुनिश्चित की जा सके।
यह फैसला न केवल सूचना का अधिकार कानून की मजबूती को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश देता है कि सूचना छिपाने, लापरवाही बरतने या आम नागरिकों को वर्षों तक भटकाने वाले अधिकारियों को अब बख्शा नहीं जाएगा। आरटीआई के जरिए जवाबदेही तय करने की यह कार्रवाई आम लोगों के अधिकारों की जीत मानी जा रही है।





