आखिर राजगीर का नाम बदलने के लिए क्यों बैचैन हैं बुद्धिजीवी?

राजगीर (नालंदा दर्पण)। नाम में क्या रखा है? शेक्सपियर का यह मशहूर डायलॉग भले ही रोमांटिक संदर्भ में कहा गया हो, लेकिन राजगीर के बुद्धिजीवियों और संस्कृति प्रेमियों के लिए नाम में ही उनकी सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक गौरव और पहचान का सार छिपा है। शायद यही वजह है कि वे राजगीर का नाम बदलकर उसके प्राचीन और मूल नाम ‘राजगृह’ करने की मांग को लेकर बेचैन हैं।
तीन महीने पहले नगर परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव पर अब तक सरकार की चुप्पी ने स्थानीय लोगों में निराशा पैदा कर दी है, लेकिन उम्मीद का दामन वे नहीं छोड़ रहे। क्या यह नाम परिवर्तन सिर्फ एक शब्द का खेल है या इससे राजगीर की पर्यटन क्षमता और सांस्कृतिक अस्मिता को नई ऊंचाइयां मिलेंगी? आइए, इस मुद्दे की गहराई में उतरते हैं।
यह कहानी शुरू होती है 28 मई 2025 से जब राजगीर नगर परिषद की एक बैठक में सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव था- राजगीर का नाम बदलकर राजगृह किया जाए।
इस बैठक में नालंदा के सांसद कौशलेन्द्र कुमार की मौजूदगी ने इसे और अधिक वजनदार बना दिया। नगर परिषद के चेयरमैन और सदस्यों का तर्क साफ था कि राजगीर का वास्तविक और प्राचीन नाम राजगृह ही रहा है, जो मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी के रूप में जाना जाता है।
ऐतिहासिक ग्रंथों, बौद्ध और जैन परंपराओं में इसका उल्लेख यही नाम से मिलता है। यहां तक कि पुरातत्व स्थलों पर लगे साइनबोर्ड, सरकारी अतिथि गृह जैसे राजगृह अतिथि गृह और गंगाजी राजगृह जलाशय भी इसी नाम की पुष्टि करते हैं।
हालांकि यह मांग नई नहीं है। वर्षों से राजगीर के बुद्धिजीवी, इतिहासकार और स्थानीय निवासी इस बदलाव की पैरवी कर रहे हैं। जुलाई 2025 में यह मांग और तेज हो गई, जब विभिन्न नेताओं और संगठनों ने इसका समर्थन किया।
स्थानीय संस्कृति प्रेमियों का कहना है कि राजगीर नाम ब्रिटिश काल में विकृत हो गया, जबकि राजगृह नाम महाभारत से लेकर महावीर और बुद्ध के समय तक की गौरवशाली कहानियां समेटे हुए है।
राजगृह मगध की पहली राजधानी थी, जहां राजा बिंबिसार ने बुद्ध को अपना शिष्य बनाया। यहां गृद्धकूट पर्वत पर बुद्ध ने कई उपदेश दिए और जैन तीर्थंकर महावीर ने भी यहां वर्षों बिताए।
विकिपीडिया के अनुसार राजगीर का प्राचीन नाम राजगृह या गिरिव्रज था, जो राजाओं का घर का प्रतीक है। यहां की साइक्लोपियन दीवार, जो 2,600 साल पुरानी है और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की दौड़ में है, भी राजगृह नाम से जुड़ी हुई है।
नाम बदलने की बैचेनी की वजह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि व्यावहारिक फायदे भी हैं। राजगीर पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। यहां विश्व शांति स्तूप, गर्म पानी के कुंड, नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष और प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
बौद्ध और जैन श्रद्धालु दुनिया भर से यहां आते हैं, और वे इस जगह को ‘राजगृह’ नाम से ही जानते हैं। जैन मंदिरों और प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड पर पहले से राजगृह लिखा मिलता है।
हाल ही में बिहार सरकार ने राजगीर में दो फाइव-स्टार होटल बनाने की योजना की घोषणा की है, जो पर्यटन को और बढ़ावा देगी। लेकिन अगर नाम राजगीर रहा तो क्या यह प्राचीन पहचान से कट जाएगा?
निराशा की वजह सरकार की सुस्ती है। प्रस्ताव पारित होने के तीन महीने बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नगर परिषद ने राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं। बुद्धिजीवियों और संस्कृति प्रेमियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ज्ञापन सौंपा है, जिसमें नाम बदलने से सांस्कृतिक अस्मिता मजबूत होने की बात कही गई है।
स्थानीय लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इतिहास और संस्कृति के प्रति संवेदनशील हैं। वे जल्द ही सकारात्मक निर्णय लेंगे। अगर ऐसा हुआ तो राजगीर नहीं, बल्कि राजगृह एक नई पहचान के साथ चमकेगा। पर्यटन का हब, इतिहास का खजाना और संस्कृति का प्रतीक।
अब क्या नाम बदलने से राजगीर की कैसी किस्मत बदलेगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन बुद्धिजीवियों की बैचेनी बताती है कि नाम में बहुत कुछ रखा है। शायद गौरव, पहचान और भविष्य या फिर?







