
बेन (नालंदा दर्पण): बिहार की राजनीतिक धरती पर नालंदा विधानसभा सीट हमेशा से एक हाई-प्रोफाइल रिंग बनी रही है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का साया इतना गहरा है कि विपक्षी हवाएं भी ठिठक जाती हैं। लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में, जो कल 6 नवंबर को पहले चरण में होने हैं, यहां सात बार के विधायक श्रवण कुमार की आठवीं जीत पर सवालिया निशान लग चुका है।
एनडीए के इस ‘अभेद्य किले’ को महागठबंधन के कौशलेंद्र कुमार उर्फ छोटे मुखिया और जनसुराज के कुमारी पूनम सिन्हा से कड़ी टक्कर मिल रही है। क्या नीतीश का जादू फिर चलेगा, या विपक्ष उलटफेर कर देगा? आइए, इस सियासी घमासान के समीकरणों को करीब से देखें।
नालंदा सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक महत्व की सीट है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की धरती पर बसी यह विधानसभा, नालंदा लोकसभा का हिस्सा है और बिहार की सियासत की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती है।
1977 में बनी इस सीट पर शुरुआती दौर में कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों का दबदबा था, लेकिन 1995 से नीतीश कुमार के उदय के साथ श्रवण कुमार ने इसे जदयू का किला बना दिया।
समता पार्टी से शुरू कर जदयू तक, श्रवण ने 1995, 2000, 2005 (दो बार), 2010, 2015 और 2020 में लगातार सात जीतें हासिल कीं। अब आठवीं बार रिकॉर्ड बनाने की होड़ में वे कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
सवा तीन लाख मतदाताओं वाले इस इलाके में कुर्मी, मुस्लिम, पासवान, राजपूत, भूमिहार, बनिया, अतिपिछड़ा और मांझी वोटरों का मजबूत समर्थन जदयू को मिलता रहा है।
लेकिन इस बार हवा में बदलाव की बू आ रही है। महागठबंधन से आरजेडी के कौशलेंद्र कुमार, जिन्हें स्थानीय स्तर पर ‘छोटे मुखिया’ के नाम से जाना जाता है, जातीय समीकरण साधकर युवा और दलित वोटों पर निशाना साध रहे हैं। वहीं जनसुराज पार्टी से कुमारी पूनम सिन्हा महिलाओं और नई पीढ़ी को लुभाने की कोशिश में जुटी हैं।
दोनों ही उम्मीदवार स्थानीय मुद्दों जैसे बेरोजगारी, शिक्षा की खराब हालत और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को जोर-शोर से उठा रहे हैं। एक ओर जहां एनडीए नीतीश सरकार की उपलब्धियों सड़कें, बिजली, उज्ज्वला जैसी योजनाओं का बखान कर रहा है, वहीं विपक्ष ‘सुशासन’ के नाम पर वादों और हकीकत के फर्क को उजागर कर रहा है।
श्रवण कुमार के लिए यह चुनाव निजी सम्मान का सवाल बन चुका है। नीतीश के बेहद करीबी माने जाने वाले वे मंत्री स्तर पर विकास कार्यों का श्रेय लेते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर विधायकों के कामकाज को लेकर असंतोष की आवाजें तेज हैं।
नए मतदाताओं का रुख अनिश्चित है। युवा रोजगार और शिक्षा के नाम पर वोट डाल सकते हैं, जबकि महिलाएं कल्याण योजनाओं से प्रभावित हो सकती हैं। राजद और भाजपा यहां कभी जीत नहीं पाए, जो जदयू के गढ़ को और मजबूत बनाता है, लेकिन जनसुराज जैसे नए खिलाड़ी समीकरण बदल सकते हैं।
कुल मिलाकर नालंदा का यह मुकाबला बिहार की सियासत का आईना है, जहां नीतीश का पुराना जादू नई चुनौतियों से टकरा रहा है। क्या श्रवण कुमार आठवीं बार ताज पहनेंगे या विपक्ष का सपना साकार होगा? 6 नवंबर को मतगणना के बाद ही साफ होगा।
फिलहाल, नालंदा की सड़कों पर प्रचार का शोर थम चुका है, लेकिन उत्साह हवा में लहरा रहा है। नालंदा दर्पण इसकी हर धड़कन पर नजर रखे हुए है।





