
नालंदा दर्पण डेस्क / मुकेश भारतीय। प्राचीन ज्ञान की भूमि नालंदा बिहार की राजनीति में भी एक अनूठा स्थान रखता है। नालंदा विधानसभा क्षेत्र, जो नालंदा लोकसभा का हिस्सा है, आज वह केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह क्षेत्र ही नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों का एक जटिल रणक्षेत्र भी है।
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही नालंदा में कुरमी, यादव, मुस्लिम और अन्य ओबीसी-दलित समुदायों की गतिशीलता फिर से सुर्खियों में है। क्या जनता दल (यूनाइटेड) का कुरमी-केंद्रित गढ़ अटल रहेगा या जातिगत ध्रुवीकरण 2025 में नया इतिहास रचेगा?
1977 में नालंदा विधानसभा के गठन के बाद से यहाँ की राजनीति में जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शुरुआती दशकों में कांग्रेस के श्याम सुंदर प्रसाद (1977, 1985) और निर्दलीय राम नरेश सिंह (1980, 1990) की जीत ने नालंदा की सामाजिक विविधता को दर्शाया। जहाँ कुरमी, यादव और ऊँची जातियों के मतदाताओं ने मिलकर परिणाम तय किए।
वहीं 1995 में समता पार्टी के श्रवण कुमार की जीत ने कुरमी समुदाय को केंद्र में ला दिया, जो नीतीश कुमार की क्षेत्रीय और जातिगत पहचान से प्रेरित थी। उसी छांव में श्रवण कुमार ने 1995, 2000, 2005, 2010, 2015 और 2020 में लगातार जीत हासिल की।
उनकी सफलता का आधार नालंदा का कुरमी-प्रधान मतदाता वर्ग रहा, जो जदयू और नीतीश कुमार के प्रति निष्ठावान है। 2020 के चुनाव में श्रवण कुमार ने 66,066 वोट हासिल कर कौशलेन्द्र कुमार (49,989 वोट) को 16,077 वोटों से हराया। वहीं कांग्रेस के गुंजन पटेल (17,293 वोट) तीसरे स्थान पर रहे, जिन्हें यादव और मुस्लिम मतदाताओं का आंशिक समर्थन मिला।
वर्ष 2015 में बीजेपी के कौशलेन्द्र कुमार ने कुरमी वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की, जिससे श्रवण की जीत का अंतर केवल 2,996 वोट रह गया। यह दर्शाता है कि कुरमी समुदाय की एकजुटता के बावजूद यादव, मुस्लिम और अन्य ओबीसी समुदायों की गतिशीलता नालंदा में खेल बदल सकती है। 2010 में श्रवण ने राजद के अरुण कुमार (यादव) को 21,037 वोटों से हराया, जो कुरमी-यादव ध्रुवीकरण को उजागर करता है।
अब 2025 के चुनाव नालंदा में जातिगत समीकरणों के लिए एक बड़ा इम्तिहान होंगे। नालंदा की जनसांख्यिकी में कुरमी (लगभग 20-25%), यादव (15-20%), मुस्लिम (15%) और अन्य ओबीसी व दलित समुदाय (35-40%) प्रमुख हैं।
कुरमी मतदाता जदयू के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। खासकर नीतीश की विकास नीतियों,जैसे- सड़क, शिक्षा और नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुद्धार के कारण। लेकिन यादव और मुस्लिम मतदाता, जो परंपरागत रूप से राजद और कांग्रेस की ओर झुकते हैं, विपक्ष के लिए अवसर पैदा करते हैं।
हाल के ‘25 से 30 फिर से नीतीश’ के नारों से जदयू का आत्मविश्वास झलकता है, लेकिन उनके विरोधी गैर-कुरमी ओबीसी और युवा मतदाताओं को लुभा सकते हैं। 2015 में बीजेपी ने कुरमी-भूमिहार गठजोड़ की कोशिश की थी। लेकिन 2025 में राजद-कांग्रेस गठबंधन यदि यादव-मुस्लिम वोटों को एकजुट कर ले तो श्रवण कुमार के लिए चुनौती बढ़ सकती है।
अब जदयू की रणनीति केवल कुरमी मतदाताओं पर निर्भर रहेगी या नीतीश की समावेशी छवि अन्य समुदायों को भी आकर्षित करेगी? नालंदा में 2024 तक मतदाताओं की संख्या 3,26,659 तक पहुँच चुकी है, जिसमें युवा और दलित मतदाता भी निर्णायक हो सकते हैं।
नालंदा की राजनीति केवल जातिगत गणित तक सीमित नहीं है। यहाँ की प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की विरासत और नीतीश कुमार का व्यक्तिगत प्रभाव इसे बिहार की राजनीति का केंद्र बनाता है। कुरमी समुदाय की निष्ठा ने जदयू को मजबूत किया है। लेकिन यादव, मुस्लिम और दलित मतदाताओं की गतिशीलता 2025 में नया रंग ला सकती है।
आगे देखना यह होगा कि क्या श्रवण कुमार अपनी जीत का सिलसिला जारी रखेंगे या जातिगत ध्रुवीकरण और नए राजनीतिक चेहरों का उदय नालंदा के इतिहास में नया अध्याय लिखेगा? जवाब नालंदा के मतदाताओं के हाथों में है, जो इस ऐतिहासिक भूमि की राजनीतिक दिशा तय करेंगे।










