कोर्ट की अवहेलना: नालंदा SP को सारे SHO पर कार्रवाई का सख्त निर्देश

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। एक चौंकाने वाली मामला में  बिहारशरीफ व्यवहार न्यायालय ने पुलिस की लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए सारे थाना प्रभारी के खिलाफ कार्रवाई का आदेश जारी किया है। यह मामला न्यायिक आदेशों की अवहेलना का स्पष्ट उदाहरण है, जहां पुलिस ने अदालत के निर्देश को नजरअंदाज कर दिया।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनीष कुमार ने इस प्रकरण को अत्यंत गंभीर मानते हुए नालंदा के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को तत्काल उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। स्थानीय लोगों में इस फैसले से हलचल मच गई है, क्योंकि यह पुलिस की जवाबदेही पर सवाल उठाता है।

मामले की जड़ अप्रैल 2020 में हुई एक हिंसक घटना में छिपी है। सारे थाना क्षेत्र के गिलानी बिगहा गांव की एक महिला ने आरोप लगाया था कि संतोष कुमार और उसके पांच साथियों ने उसके साथ गंभीर मारपीट की, जिससे वह बुरी तरह जख्मी हो गई। महिला की शिकायत पर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपितों के घर से कुछ सामान जब्त किया। यह सामान सबूत के रूप में जब्त किया गया था, लेकिन मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ ही एक नया मोड़ आया।

आरोपित संतोष कुमार ने न्यायालय में अपील दाखिल की और जब्त किए गए सामान को रिहा करने की मांग की। न्यायालय ने इस अनुरोध पर विचार करते हुए सभी जब्त सामान को मुक्त करने का स्पष्ट आदेश जारी किया। लेकिन यहां से शुरू हुई पुलिस की लापरवाही की कहानी।

थाना प्रभारी ने न तो अदालत के आदेश का पालन किया और न ही सामान को वापस किया। यह अवहेलना इतनी गंभीर थी कि न्यायालय को मजबूरन थाना प्रभारी को शो कॉज नोटिस जारी करना पड़ा, जिसमें उनसे इस देरी और अनदेखी का कारण पूछा गया।

थाना प्रभारी की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आया। नोटिस का कोई उत्तर नहीं दिया गया और सामान भी मुक्त नहीं किया गया। इस निरंतर अवहेलना से न्यायालय का धैर्य चुक गया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनीष कुमार ने मामले की सुनवाई के दौरान इसे न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना करार दिया।

उन्होंने कहा कि पुलिस का यह रवैया न केवल न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि आम नागरिकों के विश्वास को भी ठेस पहुंचाता है। न्यायाधीश ने एसपी को पत्र लिखकर थाना प्रभारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का सख्त निर्देश दिया।

यह घटना नालंदा जिले में पुलिस-न्यायालय के रिश्तों पर नई बहस छेड़ सकती है। स्थानीय वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामलों में पुलिस की लापरवाही आम हो गई है, जो न्याय की रफ्तार को धीमा करती है। महिला पीड़िता के परिवार ने इस फैसले का स्वागत किया है।

उन्होंने कहा कि पुलिस की देरी से उन्हें न्याय मिलने में और विलंब हो रहा था। अब एसपी की ओर से क्या कार्रवाई होती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। यदि कार्रवाई नहीं हुई तो न्यायालय आगे और कड़े कदम उठा सकता है, जिसमें जुर्माना या अन्य दंड शामिल हो सकते हैं।

नालंदा पुलिस अधीक्षक कार्यालय से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार आंतरिक जांच शुरू हो गई है। यह मामला पुलिस विभाग के लिए एक सबक हो सकता है कि न्यायिक आदेशों का पालन न केवल कर्तव्य है, बल्कि कानून की मर्यादा भी।

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