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बोले मगही पान अनुसंधान केंद्र प्रभारी- अश्वगंधा की खेती का लाभ उठाएं किसान

इस्लामपुर (नालंदा दर्पण रिपोर्टर)। इस्लामपुर प्रखंड स्थित मगही पान अनुसंधान केंद्र के परिसर मे अश्वगंधा पौधा लगाकर परीक्षण किया जा रहा है। जिसे इंडियन जिनसेंग या विंटर चेरी के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधा आयुर्वेदिक चिकित्सा में एक प्रमुख जड़ी-बूटी है। इसका उपयोग तनाव कम करने, नींद सुधारने, ऊर्जा और शारीरिक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ कई अन्य स्वास्थ्य लाभों के लिए किया जाता है। इसकी जड़ों और पत्तियों का उपयोग दवाइयों, पाउडर या कैप्सूल के रूप में किया जाता है।

पान अनुसंधान केन्द्र प्रभारी एसएन दास ने नालंदा दर्पण को बताया कि अश्वगंधा के लिए उपयुक्त भूमि वह है। जो बलुई दोमट या हल्की लाल मिट्टी हो और जिसमें अच्छी जल निकासी हो, जिसका पीएच मान 7.5 से 8.0 के बीच हो। यह रेतीली, काली और दोमट मिट्टी में भी अच्छी तरह से उगता है।

उन्होंने बताया कि बिहार में औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत अश्वगंधा की खेती का प्रदर्शन किया है। शोधकर्ताओं ने किसानों के लिए उपयुक्त अश्वगंधा की किस्मों की पहचान करने के लिए परीक्षण किए हैं। जिसमे पोशिता नामक एक उच्च उपज वाली किस्म का उपयोग बेगूसराय जिले में प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) के लिए किया गया था, जिसमें अच्छे परिणाम मिले।

केंद्र के प्रभारी सह वैज्ञानिक डॉ. एस.एन. दास, ने इस बात पर जोर दिया है कि बिहार की सूखी और पथरीली जमीन, खासकर ऊंची जमीन, अश्वगंधा की खेती के लिए बहुत उपयुक्त है। इन परीक्षणों के माध्यम से यह परिणाम  पाया गया है कि बिहार में अश्वगंधा की खेती धान, गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में 38 से 51 प्रतिशत तक अधिक शुद्ध आय प्रदान कर सकती है।  इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। 6 तरह की अश्वगंधा का पर्वेद का परीक्षण चल रहा है। जिसमें गुजरात आनंद अश्वगंधा, वल्लव अश्वगंधा-1,  जवाहर अश्वगंधा-20, जवाहर अश्वगंधा-134, राज विजया अश्वगंधा-100 और अरका अश्वगंधा शामिल है।

उन्होंने कहा कि अश्वगंधा की खेती बिहार में हो सकती है और यह राज्य के कई हिस्सों में सफल भी रही है। बेगूसराय और भागलपुर जिलों में इसकी खेती को सफल पाया गया है और अब गोपालगंज, सिवान और सारण जैसे जिलों में भी किसानों को इसकी खेती की सलाह दी जा रही है।

बिहार सरकार औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा दे रही है, जिसमें अश्वगंधा एक महत्वपूर्ण फसल है। अश्वगंधा का बाज़ार भाव अलग-अलग रूपों में भिन्न होता है। ताज़ी जड़ों का भाव लगभग 338 रुपया किलो ग्राम हो सकता है। जबकि मंडी में अच्छी गुणवत्ता वाली सूखी जड़ों का कीमत 35,000 से 50,000 रुपया प्रति क्विंटल तक हो सकता है। तैयार उत्पादों जैसे पाउडर या कैप्सूल का मूल्य ब्रांड और मात्रा के आधार पर अलग-अलग होता है।

गुणवत्ता के आधार पर अश्वगंधा के कई फायदे हैं। जिनमें तनाव और चिंता कम करना, तनाव हार्मोन कोर्टिसोल को नियंत्रित करना, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना और बेहतर नींद में मदद करना शामिल है। यह मांसपेशियों की ताकत और सहनशक्ति को भी बढ़ा सकता है। मस्तिष्क के कार्य और याददाश्त में सुधार कर सकता है। रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।

अश्वगंधा की जड़ों और पत्तियों से घोड़े के मूत्र जैसी गंध आती है। यह गंध ही इस जड़ी-बूटी के नाम का कारण है। क्योंकि संस्कृत में अश्व का अर्थ घोड़ा और गंध का अर्थ गंध है। इस गंध के साथ-साथ इसका नाम अश्व जैसी शक्ति और स्फूर्ति प्रदान करने की क्षमता को भी दर्शाता है। इस पौधे को विथानिया सोम्नीफेरा  के नाम से भी जाना जाता है, जिसका लैटिन शब्द सोम्नीफेरा का अर्थ है नींद लाने वाला है। इस पौधा का उत्पादन कर किसान लाभांवित हो सकते है।

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