इंसान अमीर तो हो सकता है…लेकिन अमर नहीं…!!

एक बार की बात है, प्राचीन भारत में एक अमीर राजा था, नाम था विक्रमादित्य। वह धन-दौलत में डूबा हुआ था। उसके महल सोने-चांदी से बने थे, रानी के गहने हीरे-मोतियों से लदे रहते थे, और खजाना इतना था कि सात पीढ़ियां आराम से राज कर सकती थीं। पूरा राज्य उसे “धनपति विक्रमादित्य” कहता था।
लेकिन विक्रमादित्य को एक चीज खटकती थी- मृत्यु। वो सोचता, “मैं इतना अमीर हूं, हर चीज खरीद सकता हूं- सुख, सम्मान, सेना, यहां तक कि लोगों की वफादारी भी। लेकिन मौत को कैसे खरीदूं? मैं अमर क्यों नहीं हो सकता?”
एक दिन जंगल में शिकार करते हुए उसे एक बूढ़ा साधु मिला। राजा ने साधु से पूछा, “महाराज, क्या अमर होने का कोई उपाय है?”
साधु मुस्कुराए और बोले, “है, राजन। हिमालय की एक गुफा में अमृत कुंड है। जो उसका जल पी लेता है, वो अमर हो जाता है। लेकिन रास्ता खतरनाक है- भूत-प्रेत, जंगली जानवर, और सबसे बड़ा खतरा… तुम्हारा अपना लालच।”
विक्रमादित्य ने हंसकर कहा, “लालच? मैं तो पहले से ही सबसे अमीर हूं। मुझे और क्या चाहिए?” उसने अपनी सबसे कीमती सेना और रथ तैयार किए और चल पड़ा।
रास्ते में उसे कई परीक्षाएं मिलीं। एक जगह सोने की खान मिली- उसने थोड़ा सा लिया, फिर सोचा, “अमर होने के बाद तो सारा संसार मेरा होगा, ये सोना क्या चीज है?” और आगे बढ़ गया।
एक जगह अप्सराएं नाच रही थीं- उसने देखा और मुस्कुराकर बोला, “मेरे महल में इससे सुंदर नर्तकियां हैं।” और चल दिया।
आखिरकार वो गुफा में पहुंचा। वहां अमृत कुंड था- चमकदार, नीला जल। लेकिन कुंड के पास एक शिलालेख था:
“जो अमृत पीना चाहे, पहले अपना सबसे कीमती खजाना यहां छोड़ दे।”
विक्रमादित्य सोच में पड़ गया। उसका सबसे कीमती खजाना क्या था? उसका सोना? नहीं। उसकी सेना? नहीं। अचानक उसे समझ आया- उसका सबसे कीमती खजाना था… उसका “अहंकार” कि वो सबसे अमीर है, सबसे शक्तिशाली है।
लेकिन अहंकार छोड़ना इतना आसान थोड़ा है भला? वो कुंड के पास बैठ गया। घंटों बीत गए। दिन गुजर गए। वो सोचता रहा, “अगर मैं अमर हो गया, तो सारा संसार मेरा होगा। लेकिन अगर मैंने अहंकार छोड़ दिया, तो मैं विक्रमादित्य ही नहीं रहूंगा।”
आखिर में उसने फैसला किया- अमृत नहीं पीएगा। वो वापस लौट आया। महल पहुंचकर उसने अपना सारा खजाना दरवाजे खोलकर बांट दिया। लोगों को दान दिया, अस्पताल बनवाए, स्कूल खोले। और शांतिपूर्वक जिया।
मरते समय उसके बेटे ने पूछा, “पिताजी, आपको अमर होने का मौका मिला था, फिर लौट क्यों आए?”
विक्रमादित्य मुस्कुराए और बोले, “बेटा, मैं समझ गया था- इंसान अमीर तो बन सकता है, अपना नाम, अपनी यादें, अपने अच्छे कामों से लोगों के दिलों में अमर हो सकता है… लेकिन शरीर से अमर? वो सिर्फ भगवान के बस की बात है। मैंने जो छोड़ा, वो लालच था। जो पाया, वो सुकून था।”
और इस तरह विक्रमादित्य शरीर से तो मरा, लेकिन उसके अच्छे कामों की वजह से आज भी लोग उसे याद करते हैं- सच्चे अर्थों में अमर हो गया।
सीख यही है: धन कमाया जा सकता है, नाम कमाया जा सकता है, लेकिन मृत्यु को कोई नहीं हरा सकता। जो इस सच को स्वीकार कर जीता है, वही सच में जीता है।





