नालंदा दर्पण डेस्क / रामकुमार वर्मा। मगध की धरती सदियों से ज्ञान, संस्कृति और परंपरा की जननी रही है। इसी पवित्र मिट्टी से जुड़ा एक ऐसा प्राकृतिक उपहार है, जिसने आज देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बना ली है और वह है मगही पान। स्वाद, सुगंध और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध मगही पान अब केवल परंपरागत खान-पान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैज्ञानिक शोध, स्वास्थ्य लाभ और आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बनता जा रहा है।
मगही पान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. शिवनाथ दास के अनुसार मगही पान का पत्ता पहले से ही देश और विदेशों में मशहूर है और इसके पीछे इसका विशिष्ट रासायनिक व औषधीय गुण ही सबसे बड़ा कारण है।
डॉ. दास बताते हैं कि वर्ष 2024 में इस प्रखंड के कई मगही पान कृषकों के खेतों से पान के पत्तों का संग्रह कर वैज्ञानिक टीम द्वारा विस्तृत शोध कराया गया था। इस शोध में विभिन्न किस्मों के पान के पत्तों को शामिल किया गया, जिनमें मगही पान के पत्ते औषधीय गुणों की दृष्टि से सबसे उत्तम पाए गए।
शोध के दौरान मगही पान की ऊपरी सतह और निचली सतह के पत्तों को अलग-अलग एकत्र कर उनका विश्लेषण किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इस पान की संरचना और गुण अन्य पानों से अलग और विशिष्ट हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार मगही पान में ऐसे कई जैव-सक्रिय तत्व पाए जाते हैं जो इसे केवल एक मुखवास ही नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक औषधि के रूप में स्थापित करते हैं।
डॉ. शिवनाथ दास का कहना है कि मगही पान का पत्ता गुणकारी होने के साथ-साथ अत्यंत फायदेमंद भी है। पान के पत्ते का सेवन वासी मुंह करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा पान के पत्ते का काढ़ा बनाकर सेवन करना भी बेहद असरदार बताया गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यदि एक गिलास पानी में दो मगही पान के पत्तों को उबालकर पानी आधा रह जाने तक पकाया जाए और फिर छानकर उस पानी का सेवन किया जाए तो यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होता है। नियमित सेवन से पेट संबंधी समस्याओं में धीरे-धीरे राहत मिलती है और शरीर की कई आंतरिक परेशानियों से निजात मिलने लगती है। पान का पत्ता एक नेचुरल और असरदार इलाज के रूप में उभर रहा है, जो बिना किसी साइड इफेक्ट के शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
मगही पान के पत्ते का एक और बड़ा लाभ मुंह की स्वच्छता से जुड़ा है। इसके सेवन से मुंह की बदबू कम होती है और मुंह के अंदर मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं।
रोजाना सीमित मात्रा में पान के पत्ते का उपयोग करने से मसूड़े मजबूत होते हैं और दांत लंबे समय तक स्वस्थ बने रहते हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी बुजुर्ग पान को प्राकृतिक माउथ फ्रेशनर और औषधि के रूप में देखते हैं।
स्वास्थ्य लाभों के साथ-साथ मगही पान की खेती भी किसानों के लिए आय का एक मजबूत साधन बन रही है। विशेषज्ञों के अनुसार मगही पान की खेती के लिए ऊँची और अच्छी जल निकासी वाली भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
दोमट मिट्टी, जिसमें भरपूर मात्रा में कार्बनिक पदार्थ हों, मगही पान के लिए सर्वोत्तम होती है। खेत का चयन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि बारिश के मौसम में भी पानी का स्तर कम से कम एक फीट नीचे बना रहे, ताकि जड़ों में पानी जमा न हो।
मगही पान की खेती में ‘बरेजा’ प्रणाली का विशेष महत्व है। बांस के सहारे तैयार किए गए ढाँचे पर पान की बेलों को चढ़ाया जाता है, जिससे पौधों को सहारा और छाया दोनों मिलती है।
यह छायादार वातावरण पान की कोमल पत्तियों के विकास के लिए अनुकूल होता है और उनकी गुणवत्ता को बनाए रखने में मदद करता है। बरेजा न केवल धूप और अधिक तापमान से सुरक्षा देता है, बल्कि हवा की गति को भी नियंत्रित करता है।
पौध या कलम की तैयारी मगही पान की खेती का एक अहम चरण है। स्वस्थ और रोग-मुक्त बेलों से कलम का चयन किया जाता है। रोपण से पहले इन कलमों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार कलमों को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल लगभग 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में 15 मिनट तक डुबोकर उपचारित करने से मानसून के दौरान पौधे स्वस्थ रहते हैं और फफूंदजनित रोगों का खतरा कम हो जाता है।
रोपण का उपयुक्त समय भी पान की खेती में निर्णायक भूमिका निभाता है। जून-जुलाई का मानसूनी मौसम या फिर फरवरी-मार्च से अगस्त तक का समय रोपण के लिए अनुकूल माना जाता है।
रोपण के दौरान 2-3 गांठों वाली कलम को मिट्टी में दबाकर लगाया जाता है, जिससे बेल जल्दी जड़ पकड़ ले। शुरुआती दिनों में पौधों की विशेष देखभाल की जरूरत होती है।
सिंचाई और जल निकासी का संतुलन मगही पान की खेती में अत्यंत आवश्यक है। पान की बेलों को निरंतर नमी की आवश्यकता होती है। इसलिए शुरुआती चार दिनों तक दिन में 2-3 बार सिंचाई करनी पड़ सकती है।
इसके साथ ही खेत में अतिरिक्त पानी के निकास की समुचित व्यवस्था होना अनिवार्य है, क्योंकि जलभराव से जड़ सड़न और अन्य रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
पोषण प्रबंधन के तहत जैविक खाद का प्रयोग मगही पान की खेती में विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध हुआ है। गोबर की खाद और कम्पोस्ट के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पत्तों की गुणवत्ता में सुधार होता है।
रासायनिक उर्वरकों का सीमित और संतुलित उपयोग जैविक खाद के साथ करने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत भी बनी रहती है।
कीट एवं रोग प्रबंधन के क्षेत्र में मगही पान अपेक्षाकृत मजबूत माना जाता है। फाइटोफ्थोरा जैसे रोग के प्रति यह मध्यम प्रतिरोधी होता है, फिर भी सावधानी आवश्यक है। फफूंदनाशक के रूप में बोर्डो मिश्रण में कॉपर सल्फेट और चूना शामिल होता है, उसका प्रयोग प्रभावी माना गया है। इसके अलावा फसल चक्र अपनाने और खेत की साफ-सफाई बनाए रखने से रोगों का प्रकोप काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कटाई की बात करें तो पान की बेल लगाने के लगभग 180 से 210 दिनों बाद पत्ते तोड़ने योग्य हो जाते हैं। समय पर और सावधानीपूर्वक कटाई करने से पत्तों की गुणवत्ता बनी रहती है और बाजार में बेहतर दाम मिलते हैं।
कुछ किसान पत्तों को 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुखाकर उनका प्रसंस्करण भी करते हैं, जिससे उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है और दूर-दराज के बाजारों तक आपूर्ति संभव हो पाती है।
आज मगही पान केवल एक पारंपरिक उत्पाद नहीं रह गया है, बल्कि यह स्वास्थ्य, विज्ञान और खेती के संगम का प्रतीक बन चुका है। वैज्ञानिक शोध इसके औषधीय गुणों को प्रमाणित कर रहे हैं।
वहीं किसान आधुनिक तकनीकों को अपनाकर इसकी खेती से आर्थिक मजबूती हासिल कर रहे हैं। नालंदा और आसपास के क्षेत्रों के लिए मगही पान आने वाले समय में पहचान और समृद्धि का बड़ा माध्यम बन सकता है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो मगही पान प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है, जो स्वाद के साथ सेहत देता है और खेती के साथ रोजगार। यदि वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी सहयोग और किसानों की मेहनत इसी तरह एकजुट रही तो वह दिन दूर नहीं जब मगही पान वैश्विक स्तर पर भारतीय कृषि और आयुर्वेदिक परंपरा का मजबूत प्रतिनिधि बनकर उभरेगा।





