मेले की व्यवस्था पर कुछ पंडा समूहों का वर्चस्व है और प्रशासन हर साल की तरह इस बार भी पहले से तैयारी करने में नाकाम रहा…
बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के दीपनगर थाना क्षेत्र के मघड़ा गांव स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला मंदिर में मंगलवार सुबह हुई भगदड़ की घटना अब केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्थागत विफलता और आरोपों की परतें खोलती एक बड़ी त्रासदी बनकर सामने आ रही है। राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस हादसे में कम से कम श्रद्धालुओं की मौत हुई, जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं, जबकि दर्जनभर से अधिक लोग घायल हुए हैं।
इस घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत, आक्रोश और सवालों का माहौल है। जहां प्रशासन इसे भीड़ के अचानक बढ़ने का नतीजा बता रहा है, वहीं प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय लोगों के बयान कई गंभीर आरोपों की ओर इशारा कर रहे हैं।
सिर्फ 20 फुट की कतार और ढाई घंटे का इंतजार: मंदिर से लौटे श्रद्धालुओं का कहना है कि भीड़ उतनी ज्यादा नहीं थी जितनी बाद में बताई जा रही है, लेकिन दर्शन की प्रक्रिया बेहद धीमी थी। कई श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया कि कुछ पंडे पैसे लेकर पीछे के रास्ते से लोगों को अंदर भेज रहे थे। इससे सामान्य कतार में लगे लोगों का धैर्य टूटने लगा और धीरे-धीरे स्थिति तनावपूर्ण होती चली गई।
राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई है कि टूटती कतार, अचानक भीड़ का दबाव और सुरक्षा इंतजामों की कमी इस हादसे की मुख्य वजह बनी।
श्रद्धालुओं के अनुसार मंदिर परिसर में कई जगह जबरन चढ़ावा दिलवाने की प्रक्रिया इतनी धीमी थी कि हर व्यक्ति को 10–12 मिनट तक रुकना पड़ रहा था। इससे भीड़ आगे बढ़ने के बजाय पीछे जमा होती चली गई और अंततः बैरिकेडिंग टूटने के बाद भगदड़ मच गई।
25 हजार की भीड़, लेकिन व्यवस्था नदारतः रिपोर्टों के मुताबिक घटना के समय करीब 20 से 25 हजार श्रद्धालु मंदिर परिसर और आसपास मौजूद थे, लेकिन भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं था। कई मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि मौके पर सुरक्षा इंतजाम बेहद कमजोर थे और भीड़ प्रबंधन की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी।
प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि जब भगदड़ मची तब न तो तुरंत एंबुलेंस पहुंची और न ही फायर ब्रिगेड की कोई व्यवस्था दिखी। घायल लोगों को स्थानीय लोग ही बाहर निकालकर अस्पताल ले गए।
जांच में सामने आ रही गंभीर खामियां: प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि मंदिर परिसर के भीतर अस्थायी दुकानों और अतिक्रमण के कारण निकासी के रास्ते संकरे हो गए थे।
कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि भीड़ अचानक बढ़ने के बाद रास्ता जाम हो गया और लोगों को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला, जिससे भगदड़ और घातक हो गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मेले की व्यवस्था पर कुछ पंडा समूहों का वर्चस्व है और प्रशासन हर साल की तरह इस बार भी पहले से तैयारी करने में नाकाम रहा।
आस्था का केंद्र की व्यवस्था पर सवालः मघड़ा गांव का शीतला मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान भी है। चैत्र माह के मंगलवार को यहां हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। इस बार भी उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और दिल्ली समेत कई राज्यों से लोग यहां पहुंचे थे।
इतनी बड़ी भीड़ हर साल आने के बावजूद यदि सुरक्षा व्यवस्था पहले से नहीं की गई, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक विफलता मानी जा रही है।
हादसा या सिस्टम की विफलता? शीतला मंदिर की इस त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।
यदि आरोप सही साबित होते हैं कि पैसे लेकर अवैध प्रवेश कराया जा रहा था और सुरक्षा इंतजाम कमजोर थे, तो यह केवल एक हादसा नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का उदाहरण होगा।
बहरहाल नालंदा की यह घटना सिर्फ एक मंदिर की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे राज्य की भीड़ प्रबंधन प्रणाली और प्रशासनिक तैयारी पर बड़ा सवाल बनकर खड़ी हो गई है।


