हिलसा कोर्ट में डीजीपी, एसपी समेत 11 अधिकारियों पर मुकदमा, जानें क्या है मामला

हिलसा (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के हिलसा अनुमंडल न्यायालय में एक अत्यंत चर्चित और संवेदनशील मामले की सुनवाई होने जा रही है। बिहार के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), नालंदा के पुलिस अधीक्षक (एसपी) सहित बिहार सरकार के विभिन्न विभागों के कुल 11 वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे पर प्रथम अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी हेमंत कुमार के न्यायालय में सुनवाई होगी। यह मामला जिले के इस्लामपुर थाना क्षेत्र के बकौर गांव से जुड़े भूमि विवाद से संबंधित है, जिसने अब प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है।
इस मामले की शुरुआत इसी वर्ष 2 जनवरी को हुई, जब बकौर गांव निवासी अधिवक्ता सिकंदर उर्फ सिकंदर पांडेय ने न्यायालय में दो अलग-अलग परिवाद दर्ज कराए। ये दोनों मामले परिवाद संख्या 4 और 5 के रूप में दर्ज हैं।
परिवाद संख्या 4 में इस्लामपुर के तत्कालीन अंचल अधिकारी अनुज कुमार, तत्कालीन राजस्व कर्मचारी उपेंद्र कुमार तथा तत्कालीन अंचल राजस्व अधिकारी अनीश कुमार को अभियुक्त बनाया गया है। वहीं परिवाद संख्या 5 में पुलिस और प्रशासन के और भी उच्च अधिकारियों को नामजद किया गया है।
दूसरे परिवाद में इस्लामपुर के थाना अध्यक्ष अनिल कुमार पांडेय, सहायक अवर निरीक्षक हेमंत कुमार, नालंदा के पुलिस अधीक्षक भारत सोनी, पटना के विधि-व्यवस्था पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक रामसेवक प्रसाद यादव, पुलिस महानिरीक्षक जितेंद्र राणा तथा बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार को अभियुक्त बनाया गया है।
इसके अलावा सामान्य प्रशासन विभाग के संयुक्त सचिव आर. एन. चौधरी, अवर सचिव सुनील कुमार तिवारी, गृह विभाग तथा राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के वर्तमान अवर सचिवों को भी नामित किया गया है।
परिवादी अधिवक्ता सिकंदर उर्फ सिकंदर पांडेय का आरोप है कि उनके गांव स्थित मकान और जमीन को लेकर उनके चचेरे भाई फणींद्र कुमार पांडेय से लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। यह मामला पटना हाई कोर्ट में भी विचाराधीन है। बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर कुछ अधिकारियों ने आपसी साजिश के तहत पद का दुरुपयोग किया। परिवाद के अनुसार, मौजा बकौर, अंचल इस्लामपुर के पंजी-02 में पेज नंबर 59, जमाबंदी 59 भाग-01 के अभिलेखों में काट-छांट और छेड़छाड़ कर जाली दस्तावेज तैयार किए गए।
परिवादी का आरोप है कि इन कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर उनके पिता कामता प्रसाद शर्मा की संपत्ति को गैरकानूनी तरीके से समाप्त दिखाया गया और उन्हें बेदखल करने की कोशिश की गई। इतना ही नहीं मकान को तोड़कर तहस-नहस करने और लाखों रुपये के घरेलू सामान की लूट का भी गंभीर आरोप लगाया गया है।
अधिवक्ता सिकंदर पांडेय का कहना है कि उन्होंने कई स्तरों पर न्याय की गुहार लगाई, लेकिन संबंधित अधिकारियों से उन्हें कोई राहत नहीं मिली, जिसके बाद न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
दोनों परिवाद भूमि विवाद से जुड़े हैं, लेकिन इनमें प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों पर लगे आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। आज की सुनवाई को लेकर न केवल स्थानीय लोगों की नजरें टिकी हैं, बल्कि जिला प्रशासन और पुलिस महकमे में भी इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज है। न्यायालय का अगला रुख क्या होगा, यह आने वाले समय में तय करेगा कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है।







