जदयू कार्यकर्ताओं के विरोध के बीच ‘हरनौत के हरि’ ने नामांकन पर्चा भरा

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बीच नालंदा जिले के हरनौत विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक तापमान अचानक चरम पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पैतृक क्षेत्र में जदयू के निवर्तमान विधायक हरिनारायण सिंह ने मंगलवार को अपना नामांकन पत्र दाखिल किया, लेकिन नामांकन का कागजात जमा होते ही पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
श्री हरिनारायण सिंह पर परिवारवाद को बढ़ावा देने और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात का आरोप लगाते हुए सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। जदयू नेता संजय कांत सिन्हा के नेतृत्व में चले इस आंदोलन ने हरनौत को सियासी भूचाल की चपेट में ला दिया है, जहां कार्यकर्ता खुलेआम टिकट बहिष्कार और उम्मीदवार को हराने की धमकी दे रहे हैं।
यह घटना न केवल जदयू की आंतरिक कलह को उजागर करती है, बल्कि बिहार की राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ बढ़ते असंतोष को भी रेखांकित करती है। हरनौत, जो नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की शुरुआत का गवाह रहा है। जहां उन्होंने 1977 से लेकर 1995 तक कई बार चुनाव लड़ा। अब उसी पार्टी के नेताओं के बीच फूट का केंद्र बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बगावत न केवल हरनौत सीट, बल्कि पूरे नालंदा लोकसभा क्षेत्र की सियासत को प्रभावित कर सकती है, जहां जदयू का पारंपरिक वर्चस्व खतरे में पड़ सकता है।
नामांकन प्रक्रिया के तुरंत बाद जदयू के स्थानीय कार्यालय के बाहर जमा हुए कार्यकर्ताओं ने हरिनारायण सिंह के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। जदयू नेता संजय कांत सिन्हा इस विरोध का प्रमुख चेहरा बने हुए हैं, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह विरोध न तो संगठन का है और न ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का। यह लड़ाई परिवारवाद के खिलाफ है और कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान की रक्षा के लिए है।
सिन्हा के अनुसार पिछले दो विधानसभा चुनावों (2015 और 2020) में स्वयं नीतीश कुमार ने हरनौत से टिकट वितरण को लेकर आश्वासन दिया था कि इस बार प्रत्याशी को जरूर बदला जाएगा। लेकिन हरिनारायण सिंह को फिर से टिकट मिलने से कार्यकर्ताओं में भारी निराशा है।
सिन्हा ने हरिनारायण सिंह पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विधायक ने खुद हरनौत की हर पंचायत में बैठकें कीं और घोषणा की थी कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, इसलिए वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगे। वे पार्टी की सेवा में जुटेंगे। लेकिन जब नीतीश कुमार ने उनके बेटे अनिल कुमार को टिकट देने से इनकार कर दिया तो ‘बीमार’ हरिनारायण सिंह खुद मैदान में कूद पड़े। यह परिवारवाद का नंगा खेल है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि नीतीश जी हमेशा परिवारवाद के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन यहां वही हो रहा है। हरिनारायण सिंह ने पहले बेटे को टिकट दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर खुद उम्मीदवार बन गए, जो पार्टी के सिद्धांतों का अपमान है। विरोध प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने बैनर और पोस्टर लहराते हुए चेतावनी दी
उन्होंने कहा कि हम हरिनारायण सिंह का मजबूती से विरोध करेंगे और उन्हें हराने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे। पार्टी जो कार्रवाई करे, हमें मंजूर है। उनकी लड़ाई किसी पद की लालसा से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के भविष्य के लिए है। आने वाले समय में किसी दल में कार्यकर्ता ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे। जब विधायकों-मंत्रियों के पुत्रों को ही टिकट मिलेगा तो साधारण कार्यकर्ता क्यों बने रहें?
कार्यकर्ताओं का आक्रोश केवल टिकट वितरण तक सीमित नहीं है। वे हरिनारायण सिंह पर जनता को गुमराह करने का भी आरोप लगा रहे हैं। सिन्हा ने कहा कि सारा विकास का श्रेय नीतीश कुमार लेते हैं, वोट हरिनारायण को मिलता है। जीतने पर वे दावा करते हैं कि जनता ने उनके काम के लिए वोट दिया, लेकिन जब कोई समस्या लेकर जाता है तो कहते हैं कि वोट तो आपने नीतीश जी को दिया है, उनके पास जाइए। हरिनारायण सिंह का यह दोहरा चरित्र कार्यकर्ताओं को खल रहा है। खासकर जब हरनौत जैसे ग्रामीण क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली और रोजगार की कमी बनी हुई है।
इसके अलावा सिन्हा ने मुख्यमंत्री तक पहुंच की समस्या पर भी इशारा किया औक कहा कि हर कार्यकर्ता को नीतीश जी से मिलने का समय नहीं मिलता। वहां ऐसे लोग बैठे हैं, जो माननीय नेता से मिलने ही नहीं देते। हमारे कार्यकर्ता सालों तक नंबर लगाए रहते हैं, फिर भी समय नहीं मिलता। यह शिकायत जदयू के निचले स्तर पर व्यापक असंतोष को दर्शाती है, जहां कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं।
सिन्हा ने अपनी साफ छवि का हवाला देते हुए कहा कि हमारे नेता ही कहते थे कि कफन में जेब नहीं होती। हम निस्वार्थ भाव से राजनीति करते हैं। नालंदा जिले में आज तक मुझ पर कोई आरोप नहीं लगा। हम मतदाता पर निर्भर हैं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है।
बता दें कि हरनौत विधानसभा क्षेत्र नालंदा जिले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां हरनौत, चंडी और नगरनौसा विकास खंड शामिल हैं। यह पूरी तरह ग्रामीण सीट है, जहां अनुसूचित जाति मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 24% है। 2020 के चुनाव में हरिनारायण सिंह ने जदयू के टिकट पर 65,404 वोट (41.24%) हासिल कर लोक जनशक्ति पार्टी की ममता देवी को 27,241 वोटों से हराया था। इससे पहले 2015 में भी उन्होंने 71,933 वोटों से जीत दर्ज की थी। लेकिन अब यह सीट जदयू के लिए खतरे की घंटी बज रही है।
नीतीश कुमार का हरनौत से गहरा नाता है। उन्होंने यहां 1985 और 1995 में जीत हासिल की थी और यह उनका ‘होम ग्राउंड’ माना जाता है। लेकिन वर्तमान बगावत ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गरम है।
कार्यकर्ताओं की मांग है कि टिकट निशांत कुमार (नीतीश के पुत्र) या संजय कांत सिन्हा को दिया जाए, ताकि परिवारवाद न फैले। नामांकन और विरोध के कई वीडियो शेयर किए गए हैं, जहां कार्यकर्ता खुलकर बगावत के सुर बिखेर रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह विरोध जदयू के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। हरनौत में जदयू का वर्चस्व रहा है, लेकिन कार्यकर्ताओं का खुला विद्रोह वोटरों को प्रभावित कर सकता है। विपक्षी दल आरजेडी और भाजपा इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बगावत नहीं थमी तो नीतीश कुमार को खुद हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। लोग प्रत्याशी के खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं। आने वाले दिनों में यह सियासी ड्रामा और तेज होगा। क्या हरिनारायण सिंह का नामांकन पार्टी के लिए अंतिम साबित होगा या नीतीश कुमार इस संकट को खुद संभाल लेंगे? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।





