
राजगीर (नालंदा दर्पण)। अध्यात्म की नगरी राजगीर प्राकृतिक सौंदर्य और पौराणिक इतिहास का एक अनोखा संगम है। लेकिन आज एक गंभीर संकट से जूझ रही है। यहां के विश्वप्रसिद्ध गर्मजल कुंड और झरने सदियों से लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। लेकिन अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि ठंढ होने से पहले ही वे सूखने की कगार पर पहुंच चुके हैं। साल दर साल इनकी हालत बदतर होती जा रही है, लेकिन समाज और सरकार की उदासीनता इस अनमोल धरोहर को निगलने पर तुली है।
बता दें कि राजगीर की मूल पहचान ही इन गर्मजल कुंडों और झरनों से अटूट रूप से जुड़ी हुई है। ब्रह्मकुंड, सप्तकुंड जैसे पवित्र स्थल न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि पर्यटन और अध्यात्म के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं। यहां आने वाले सैलानी और श्रद्धालु इन गर्म जलस्रोतों में स्नान कर पवित्रता और शांति की अनुभूति करते हैं। लेकिन अब ये कुंड सूख रहे हैं, झरनों की धाराएं पतली पड़ती जा रही हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो 2026 में लगने वाले राजकीय मलमास मेला के दौरान ये पूरी तरह ठप हो सकते हैं। इसका असर न सिर्फ धार्मिक आयोजनों पर पड़ेगा, बल्कि राजगीर की पौराणिक धरोहर भी हमेशा के लिए लुप्त हो सकती है।
इस संकट की जड़ में भेलवाडोभ जलाशय की दुर्दशा है। साधु-संतों और महंतों के अनुसार इन कुंडों और झरनों के जलस्रोत सीधे इस जलाशय से जुड़े हुए हैं। लेकिन जलाशय में वर्षों से सिल्ट और गाद जमा हो गई है, जिससे यह उथला हो चुका है। नतीजा? बारिश का पानी संग्रहित नहीं हो पाता और कुंडों तक जल पहुंच ही नहीं पाता। जबकि ये कुंड राजगीर की आत्मा हैं। ऋषि-मुनियों की साधना स्थली है, जहां अनेक पौराणिक कथाएं जीवंत हैं। लेकिन अब ये मरने की कगार पर हैं। भेलवाडोभ की सफाई और उड़ाही न हुई तो सब कुछ खत्म हो जाएगा।
यह समस्या सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक भी है। चुनावी मौसम में जनप्रतिनिधि हर मुद्दे को भुनाते हैं, लेकिन इन कुंडों की रक्षा कभी चुनावी एजेंडा नहीं बनी। स्थानीय लोग तो चिंतित हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस योजना नहीं दिख रही। प्रशासन को तुरंत जलाशय की सफाई, संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए कदम उठाने चाहिए। क्योंकि यह केवल प्राकृतिक उपहार नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है।
राजगीर के इन गर्मजल कुंडों का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। पौराणिक ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है, जहां इन्हें चमत्कारी और औषधीय गुणों वाला बताया गया है। यहां के जल में सल्फर और अन्य खनिज होते हैं, जो त्वचा रोगों और जोड़ों के दर्द में राहत देते हैं। पर्यटन की दृष्टि से भी ये महत्वपूर्ण हैं। हर साल लाखों पर्यटक यहां आते हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं। लेकिन सूखते कुंडों से पर्यटन उद्योग भी प्रभावित हो रहा है। पिछले साल इस समय झरने की धारा जोरदार थी। लेकिन इस बार अभी से बूंद-बूंद टपक रही है। यह दुखद है।
धर्माचार्यों की चिंता और गहरी है। वे मानते हैं कि ये कुंड भारत की प्राचीन संस्कृति का प्रतीक हैं। शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर काम करना होगा। जनसहभागिता से ही इस विरासत को बचा सकते हैं। भेलवाडोभ जलाशय की सफाई अभियान शुरू हो। कुंडों के आसपास वनरोपण हो और जल संरक्षण की योजनाएं लागू हों।
बहरहाल, समय तेजी से बीत रहा है। वर्ष 2026 का मलमास मेला नजदीक है, जहां लाखों श्रद्धालु इन कुंडों में स्नान करने आएंगे। यदि तब तक सुधार नहीं हुआ तो न केवल धार्मिक भावनाएं आहत होंगी, बल्कि राजगीर की पहचान पर स्थायी दाग लग जाएगा। नालंदा दर्पण की टीम मानती है कि यह मुद्दा सिर्फ राजगीर का नहीं, बल्कि पूरे बिहार और भारत की सांस्कृतिक धरोहर का है। आइए, हम सब मिलकर इस अनमोल उपहार को बचाएं। क्योंकि विरासत बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।





