Home धरोहर प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के दानदायी गांवों की खोज अभियान ठप

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के दानदायी गांवों की खोज अभियान ठप

Exploration of ancient Nalanda University's charitable villages stalled

राजगीर (नालंदा दर्पण संवाददाता)। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का संचालन करीब 200 गांवों के सहयोग से होता था। इसका उल्लेख चीनी यात्री इ-त्सिंग ने अपने यात्रा-वृत्तांत में विस्तार से किया है। उनके अनुसार राज्य की ओर से ये गांव विश्वविद्यालय को दानस्वरूप प्राप्त हुये थे। उनसे आय, अनाज, श्रम व संसाधन उपलब्ध होते थे।

इसी व्यवस्था से छात्रों को निःशुल्क शिक्षा, भोजन, वस्त्र, दवा, उपचार तथा आवास की सुविधा मिलती थी। यही कारण था कि उस समय नालंदा में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों को किसी प्रकार की आर्थिक चिंता नहीं रहती थी। लेकिन आजादी के 78 वर्ष बाद भी सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और इतिहासकार उन 200 गांवों के सटीक नाम व स्थान की पहचान नहीं कर सके हैं।

इतिहासकारों के अनुसार नालंदा विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था। इसकी आर्थिक-सामाजिक संरचना पूरी तरह उन गांवों पर आधारित थी। लगभग 800 वर्षों तक इसका संचालन इन्हीं गांवों से प्राप्त अनाज व अन्य आवश्यक वस्तुओं चलता रहा था। तिब्बती, चीनी और दक्षिण भारतीय ग्रंथों में भी उन दानदायी गांवों का उल्लेख मिलता है। परंतु उनके नामों की विस्तृत सूची अबतक उपलब्ध नहीं है।

ह्वेनसांग ने अपने विवरण में नालंदा के आसपास बसे समृद्ध गांवों का वर्णन किया है, जो विश्वविद्यालय के भरण-पोषण का मूल आधार थे। किंतु आधुनिक भौगोलिक पहचान स्थापित करना अब भी चुनौती बना हुआ है।

चौंकाने वाली बात यह है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के आसपास वर्तमान में चार बड़े विश्वविद्यालय सक्रिय हैं। उनमें दो केंद्र सरकार और दो राज्य सरकार से संपोषित। नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय, नालंदा खुला विश्वविद्यालय और बिहार खेल विश्वविद्यालय सभी किसी न किसी रूप में नालंदा की विरासत से जुड़े हैं। इसके बावजूद 200 गांवों की खोज में अबतक किसी विश्वविद्यालय ने ठोस पहल नहीं की है।

मगध विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय और अन्य शैक्षणिक-पुरातात्विक संस्थान भी इस दिशा में ठोस साक्ष्य प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं ले रहे हैं। जानकार मानते हैं कि प्राचीन काल में नालंदा एक विशाल नगर व्यवस्था का केंद्र था। विश्वविद्यालय का आर्थिक ढांचा अत्यंत सुव्यवस्थित था। सुझाव है कि चारों विश्वविद्यालयों का एक संयुक्त शोध मंच गठित किया जाना चाहिये, ताकि इतिहासकार, शोधार्थी और पुरातत्वविद् मिलकर विस्तृत अध्ययन और खोज अभियान चला सकें।

विशेषज्ञों का मत है कि भू-अभिलेखों का सर्वेक्षण, उपग्रह चित्रों का विश्लेषण, पुरातात्विक खुदाई तथा स्थानीय परंपराओं-लोककथाओं का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाय। उससे उन गांवों की संभावित पहचान सामने आ सकती है। कई स्थानीय गांव वर्षों से दावा करते रहे हैं कि वे नालंदा विश्वविद्यालय को दान देने वाले गांवों में से एक हैं। परंतु इन दावों का प्रमाणिक सत्यापन अभी तक नहीं हुआ है।

नालंदा विश्वविद्यालय प्रशासन भी वर्षों से इस दिशा में प्रयासरत है। किंतु संसाधनों की कमी, पुरातात्विक दस्तावेजों की अनुपलब्धता और ठोस साक्ष्य न मिलने के कारण खोज शून्य से आगे नहीं बढ़ पाई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी संस्थान एक साझा पहल के तहत शोध शुरू करें, तो इतिहास के इस महत्वपूर्ण अध्याय को उजागर किया जा सकता है। दुनिया के सामने नालंदा की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पुनः स्थापित की जा सकेगी।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Exit mobile version