सरकारी जमीन की अवैध जमाबंदी को 45 कार्य दिवस में निपटाने का ऐलान

नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार राज्य में सरकारी जमीन की अवैध जमाबंदी के मामलों पर अब सरकार ने निर्णायक प्रहार शुरू कर दिया है। वर्षों से लंबित और जटिल बने सरकारी जमीन के विवादों को सुलझाने के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने सख्त और समयबद्ध व्यवस्था लागू कर दी है।
इस अभियान के तहत न सिर्फ अवैध जमाबंदी रद्द की जाएगी, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी। सरकार का साफ संदेश है कि सरकारी जमीन किसी की निजी संपत्ति नहीं है और इसके साथ किसी भी तरह की गड़बड़ी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस संबंध में विभाग के प्रधान सचिव सीके अनिल ने सभी प्रमंडलीय आयुक्तों, समाहर्त्ताओं और अपर समाहर्त्ताओं को विस्तृत निर्देश जारी किए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि बिहार भूमि दाखिल-खारिज अधिनियम, 2011 की धारा 9(4) के तहत सरकारी भूमि की अवैध जमाबंदी को रद्द करना अपर समाहर्त्ता की प्राथमिक जिम्मेवारी होगी।
वे स्वप्रेरणा (सुओ मोटो) से निचले स्तर के राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट पर या किसी भी आवेदक से प्राप्त सूचना के आधार पर जांच कर राजस्व न्यायालय में वाद दर्ज करेंगे।
सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि यह कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी। सर्वे खतियान में दर्ज गैर मजरूआ आम, कैसरे हिन्द, खासमहल की भूमि के साथ-साथ जिला परिषद, नगर निकाय, ग्राम पंचायत, राज्य सरकार के विभागों, बोर्डों, निगमों, सैरातों तथा भारत सरकार के मंत्रालयों से संबंधित जमीनें भी इस अभियान के दायरे में होंगी।
इसके अतिरिक्त रक्षा, रेल, डाक विभाग, धार्मिक न्यास पर्षद, वक्फ बोर्ड, मान्यता प्राप्त ट्रस्ट, गोशाला आदि की भूमि पर यदि अवैध जमाबंदी पाई गई तो उसे भी स्वप्रेरणा से रद्द किया जाएगा।
सबसे अहम पहलू यह है कि सरकार ने वादों के निष्पादन के लिए 45 कार्य दिवस की सख्त समय-सीमा तय कर दी है। इसके तहत तीन कार्यदिवस के भीतर आरसीएमएस पोर्टल पर वाद दर्ज करना होगा। इसके बाद सात दिनों के अंदर विधि सम्मत नोटिस जारी करना अनिवार्य होगा।
सुनवाई की प्रक्रिया 15 कार्यदिवस में पूरी कर आदेश पारित किया जाएगा और उसे पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा। इस तरह पूरे मामले को पारदर्शी और ऑनलाइन ट्रैकिंग योग्य बनाया गया है, ताकि किसी भी स्तर पर अनावश्यक देरी न हो।
आदेश में यह भी प्रावधान किया गया है कि सभी अपर समाहर्त्ता अपने न्यायालय में लंबित सरकारी भूमि की जमाबंदी रद्दीकरण से जुड़े मामलों की अद्यतन सूची हर महीने मुख्यालय भेजेंगे।
पहली रिपोर्ट एक फरवरी 2026 तक मांगी गई है, जिसमें 31 दिसंबर 2025 तक के सभी मामलों का विवरण शामिल होगा। इससे सरकार को यह स्पष्ट तस्वीर मिल सकेगी कि जिलेवार और प्रमंडलवार कितने मामलों में कार्रवाई हुई और कितने अभी लंबित हैं।
अंचल अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेवारी को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। निर्देश में कहा गया है कि 3 जून 1974 से अंचल अधिकारी अपने क्षेत्र की सरकारी भूमि के लिए कलेक्टर घोषित हैं।
यदि उनके कार्यकाल में सरकारी भूमि का अवैध हस्तांतरण या निजी व्यक्तियों के नाम जमाबंदी खोलने का मामला सामने आता है तो वे विभागीय और अनुशासनिक कार्रवाई के भागी होंगे। यही नहीं अंचल अधिकारियों को पुराने अभिलेखों की गहन जांच कर 31 जनवरी 2026 तक अपनी रिपोर्ट सीधे अपर समाहर्त्ता को भेजनी होगी।
समाहर्त्ताओं को जिले में लोक भूमि, सरकारी, सैरात और सार्वजनिक भूमि का संरक्षक बताते हुए पूरे अभियान का विशेष नियंत्रण और पर्यवेक्षण करने का निर्देश दिया गया है।
सरकार का लक्ष्य केवल अवैध जमाबंदी रद्द करना ही नहीं, बल्कि कैडेस्ट्रल सर्वे (सीएस) और रिविजनल सर्वे (आरएस) में दर्ज सरकारी भूमि को वापस सरकारी खाते में लाकर जिला और अंचल स्तर पर मजबूत लैंड बैंक का निर्माण करना है। इससे भविष्य में विकास कार्यों, जनहित योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विस्तार में भूमि की कमी आड़े नहीं आएगी।
प्रधान सचिव के निर्देश में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2005 के बाद बड़े पैमाने पर हुए सरकारी भूमि के अलगाव और अवैध हस्तांतरण के मामलों की स्वयं जांच कर भूमि की वापसी सुनिश्चित करना समाहर्त्ताओं की पूर्ण जिम्मेवारी होगी। साफ है कि सरकार अब पीछे मुड़कर भी हिसाब लेने के मूड में है।
कुल मिलाकर सरकारी भूमि की अवैध जमाबंदी के खिलाफ यह अभियान प्रशासनिक सख्ती, समयबद्ध न्याय और जवाबदेही का स्पष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है। यदि निर्देशों का सही मायने में पालन हुआ तो न सिर्फ सरकारी जमीन सुरक्षित होगी, बल्कि वर्षों से चली आ रही भूमि अराजकता पर भी प्रभावी लगाम लगेगी।





