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इस्लामपुर के अमर योद्धा डॉ. चांद बाबू और जैन साहब की प्रेरणादायी गाथा

इस्लामपुर की धरती के अमर सपूत स्वतंत्रता संग्राम के नायक डॉ. चांद बाबू और ‘सिटी फादर’ जैन साहब, जिनकी सेवा और संघर्ष आज भी प्रेरणा हैं।

नालंदा दर्पण डेस्क / मुकेश भारतीय। नालंदा की धरती ने सिर्फ विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि ऐसे योद्धा भी दिए जिन्होंने बिना किसी लालच के देश और समाज की सेवा की। कल इस्लामपुर नगर में जननायक कर्पूरी ठाकुर की 102वीं जयंती के अवसर पर निकली प्रभात फेरी और आयोजित संकल्प सभा ने केवल एक राजनीतिक-सामाजिक स्मृति को ही नहीं जगाया, बल्कि इस कस्बे की उस गौरवशाली परंपरा को भी फिर से जीवंत कर दिया। जिसमें आज़ादी, समानता और सेवा एक दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं।

जैसे-जैसे तिरंगे की छाया में देशभक्ति के गीत गूंजे, वैसे-वैसे इस्लामपुर की धरती ने अपने उन सपूतों को भी याद किया, जिनके योगदान इतिहास की मुख्यधारा में अक्सर अनकहे रह गए। इन्हीं में दो नाम आज भी जनमानस में सम्मान के साथ लिए जाते हैं डॉ. लक्ष्मीचंद वर्मा उर्फ चांद बाबू  और जगदीश नंदन जैन उर्फ जैन साहब।

ये दोनों केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि ऐसे समाज निर्माता थे जिन्होंने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद दोनों कालखंडों में जनता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया। उनकी जीवन यात्राएं यह साबित करती हैं कि सच्ची देशभक्ति सिर्फ अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह भूखों को भोजन, बीमारों को इलाज और वंचितों को सम्मान दिलाने की लड़ाई भी थी।

इतिहास और परंपरा की गोद में पला इस्लामपुर

नालंदा जिले का इस्लामपुर कस्बा भले ही भौगोलिक रूप से छोटा हो, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से इसकी पहचान बहुत बड़ी रही है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की वैचारिक छाया, बौद्ध और जैन विरासत की गूंज, और स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी—इन सबका संगम इस कस्बे में देखने को मिलता है। यही कारण है कि यहां से न केवल कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेता निकले, बल्कि चांद बाबू और जैन साहब जैसे निस्वार्थ क्रांतिकारी भी उभरे।

जब कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर सामाजिक न्याय और समानता की चर्चा होती है, तो स्वतः ही उन लोगों की याद आती है जिन्होंने जमीन पर उतरकर इन मूल्यों को जिया। चांद बाबू और जैन साहब उसी परंपरा की मजबूत कड़ियां थे।

डॉ. लक्ष्मीचंद वर्मा ‘चांद बाबू’: इलाज से इंकलाब तक

डॉ. लक्ष्मीचंद वर्मा का जन्म 1902 में इस्लामपुर के एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुआ। उस दौर में, जब सुविधाएं और संसाधन सीमित थे, उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में एक उपलब्धि थी। लेकिन चांद बाबू के लिए शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं थी, बल्कि समाज को बदलने का औजार थी।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय खानकाह उच्च विद्यालय में हुई, जहां उन्होंने न केवल पुस्तकीय ज्ञान अर्जित किया, बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा से भी परिचय पाया। आगे चलकर उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और 1926 में पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की। उस समय डॉक्टर बनना सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था, लेकिन चांद बाबू ने इस पेशे को सेवा का माध्यम बना लिया।

गरीबों के सच्चे डॉक्टर थे चांद बाबू

डिग्री लेने के बाद उन्होंने इस्लामपुर में चिकित्सा सेवा शुरू की। खास बात यह थी कि वे गरीब और असहाय मरीजों से कोई फीस नहीं लेते थे। कई बार तो दवाइयों का खर्च भी खुद उठाते थे। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में, जहां ब्रिटिश शासन के दौरान स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं, चांद बाबू का क्लिनिक लोगों के लिए जीवनरेखा बन गया।

आज़ादी की लड़ाई में निर्भीक कदम

1940 के दशक में जब देश भर में स्वतंत्रता आंदोलन ने उग्र रूप लिया, चांद बाबू खुद को इससे अलग नहीं रख सके। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उन्होंने वह साहसिक कदम उठाया, जो इस्लामपुर के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। उन्होंने इस्लामपुर थाने पर चढ़कर ब्रिटिश झंडा उतार दिया और तिरंगा फहरा दिया।

बताया जाता है कि थाना प्रभारी नरसिंह सिंह ने उन पर राइफल तान दी थी, लेकिन चांद बाबू की आंखों में झलकता आत्मविश्वास और निडरता देखकर अधिकारी भी विचलित हो गया। यह घटना बाद में ‘तिरंगा विद्रोह’ के नाम से जानी गई और स्थानीय युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई।

क्रांतिकारियों का संरक्षक

चांद बाबू का घर स्वतंत्रता सेनानियों का सुरक्षित ठिकाना बन गया था। वे घायल क्रांतिकारियों का इलाज करते, उन्हें छिपने की जगह देते और आवश्यक संसाधन मुहैया कराते। 1940 से 1947 तक वे इस्लामपुर थाना कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और सत्याग्रह, जुलूस, बहिष्कार जैसे आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाई।

आज़ादी के बाद भी सेवा का पथ

देश आज़ाद हुआ, लेकिन चांद बाबू ने सत्ता और राजनीति से दूरी बनाए रखी। कई बार उन्हें विधायक चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला, लेकिन उन्होंने हर बार इनकार किया। उनका मानना था कि सेवा की राजनीति पद से नहीं, कर्म से होती है।

गांधीवादी सादगी उनके जीवन का आधार थी। एक प्रसंग अक्सर सुनाया जाता है जब बिहार के तत्कालीन उत्पाद मंत्री जगलाल चौधरी कार से सभा स्थल पर पहुंचे। चांद बाबू ने उनसे सहज लेकिन तीखे शब्दों में कहा-“गांधी के आदर्शों की बात करते हो और कार से चलते हो?” यह कथन उनकी विचारधारा का आईना था।

1957 में उन्होंने बिहारशरीफ के दीपनगर क्षेत्र में अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए जमीन दान की, जहां बाद में एक स्कूल स्थापित हुआ। यह कदम सामाजिक न्याय के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। 21 अगस्त 1974 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका जीवन आज भी इस्लामपुर की गलियों में सांस लेता है।

जगदीश नंदन जैन ‘जैन साहब’: इस्लामपुर के ‘सिटी फादर’

जगदीश नंदन जैन, जिन्हें लोग स्नेह से ‘जैन साहब’ या ‘सिटी फादर’ कहते थे, इस्लामपुर के सामाजिक जीवन की आत्मा थे। वे जैन समुदाय से थे, लेकिन उनकी सोच और कार्य पूरी तरह से मानवतावादी और धर्म-निरपेक्ष थी।

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जैन साहब ने गुप्त बैठकों का आयोजन किया, ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ जन-जागरण किया और युवाओं को आंदोलन से जोड़ा। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उनकी भूमिका खास तौर पर उल्लेखनीय रही, जब उन्होंने स्थानीय स्तर पर संगठन और नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाई।

समाज सेवा का जीवंत उदाहरण

आजादी के बाद जैन साहब ने खुद को पूरी तरह समाज सेवा में झोंक दिया। गरीब बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के सशक्तिकरण, सड़क और स्कूल निर्माण हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी रही। बाढ़ और आपदा के समय वे सबसे पहले राहत कार्यों में जुट जाते थे, कई बार अपनी निजी संपत्ति तक दान कर देते थे।

इसी निस्वार्थ भावना के कारण लोग उन्हें ‘सिटी फादर’ कहने लगे। उनका घर हर किसी के लिए खुला रहता था। चाहे समस्या छोटी हो या बड़ी, समाधान की उम्मीद वहां जरूर मिलती थी।

परिवार, स्मृतियां और विरासत

चांद बाबू की पत्नी रामप्यारी देवी ने हर कदम पर उनका साथ दिया। उनके परिवार में पांच बहनें और दो भाई हैं, जो आज देश और विदेश में रहते हुए भी अपने पैतृक गांव से जुड़े हुए हैं। वे समय-समय पर इस्लामपुर आकर उनकी स्मृतियों को जीवित रखते हैं।

जैन साहब का परिवार भी आज समाज सेवा की उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। भले ही विस्तृत विवरण उपलब्ध न हो, लेकिन उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों के व्यवहार और सोच में दिखाई देती हैं।

वर्तमान के लिए संदेश

आज, जब नालंदा जिले में धरोहर संरक्षण और विकास की बातें हो रही हैं, चाहे वह नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े सरोवरों का पुनरुद्धार हो या सांस्कृतिक पहचान को संजोने के प्रयास तो चांद बाबू और जैन साहब जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियों को संरक्षित करना भी उतना ही जरूरी है।

गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर उनकी कहानियां हमें यह याद दिलाती हैं कि आज़ादी केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक सतत जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी है समानता की, सेवा की और साहस की।

कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर उठी सामाजिक न्याय की आवाज़, और इस्लामपुर के इन अमर योद्धाओं की विरासत दोनों मिलकर हमें यही सिखाती हैं कि बड़े बदलाव अक्सर छोटे कस्बों से ही जन्म लेते हैं।

नालंदा दर्पण की ओर से डॉ. चांद बाबू और जैन साहब को शत-शत नमन। उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को देश और समाज के प्रति समर्पित रहने का मार्ग दिखाती रहेगी।

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