Home धरोहर हिलसा के सपूत राम शरण सिंह : स्वतंत्रता संग्राम से सामाजिक उत्थान...

हिलसा के सपूत राम शरण सिंह : स्वतंत्रता संग्राम से सामाजिक उत्थान तक एक अमर गाथा

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने स्वतंत्रता सेनानी

हिलसा (नालंदा दर्पण / मुकेश भारतीय)। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल बड़े शहरों, चर्चित नेताओं और राजधानी के गलियारों तक सीमित नहीं है। इस संघर्ष की असली ताकत देश के गांवों, कस्बों और छोटे इलाकों से निकले उन गुमनाम नायकों में छिपी है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपना सर्वस्व देश के नाम कर दिया। बिहार के नालंदा जिले के हिलसा प्रखंड के भोकीलापर गांव में जन्मे राम शरण सिंह ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रवादी और समाजसेवी थे। उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

हिलसा नालंदा के स्वतंत्रता सेनानी राम शरण सिंह की ऐतिहासिक तस्वीर
तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों 1972 में मिला ताम्रपत्र सम्मान

राम शरण सिंह का प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

राम शरण सिंह का जन्म वर्ष 1901 में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता श्री धन्नी सिंह और माता स्वर्गीय निकाती देवी धार्मिक, संस्कारवान और राष्ट्रप्रेमी विचारों के थे। पारिवारिक वातावरण में देशभक्ति, सत्य और सेवा की भावना बचपन से ही राम शरण सिंह के व्यक्तित्व में रच-बस गई थी।

रामायण और गीता से प्रेरित राष्ट्रवादी विचारधारा

वे बचपन से ही अध्ययनशील प्रवृत्ति के थे। धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर रामायण और भगवद्गीता, का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन ग्रंथों से उन्होंने कर्तव्य, त्याग और धर्म के वास्तविक अर्थ को समझा। यही कारण था कि आगे चलकर उनका जीवन केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित न रहकर समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित हो गया।

स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में देशभर में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था, तब राम शरण सिंह भी इस आंदोलन से जुड़ गए। वे केवल समर्थक नहीं थे, बल्कि सक्रिय क्रांतिकारी कार्यकर्ता के रूप में उभरे। नालंदा और आसपास के इलाकों में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया।

उन्होंने महावीर सिंह, केशव प्रसाद और श्रवण साहू जैसे स्थानीय और क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन को संगठित किया। गांव-गांव जाकर लोगों को अंग्रेजी हुकूमत की सच्चाई बताना, स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित करना और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

भारत छोड़ो आंदोलन और ‘हुकुम : द हिंद’ संगठन

9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक मोड़ था। इसी आंदोलन के दौरान राम शरण सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक क्रांतिकारी दल का गठन किया, जिसका नाम था “हुकुम : द हिंद”। यह संगठन ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध का प्रतीक बना।

हिलसा रेलवे लाइन क्षति की ऐतिहासिक घटना

इस दल के नेतृत्व में राम शरण सिंह ने हिलसा क्षेत्र में ब्रिटिश प्रशासन की गतिविधियों को बाधित करने के लिए कई साहसिक कदम उठाए। इसी क्रम में हिलसा रेलवे लाइन को क्षतिग्रस्त करना एक बड़ा कदम था, जिसने अंग्रेजी सरकार को हिलाकर रख दिया। यह घटना ब्रिटिश हुकूमत के लिए सीधी चुनौती थी और इसके बाद इलाके में दमनात्मक कार्रवाई तेज हो गई।

जेल जीवन और संघर्षः बिहार शरीफ जेल में 14 माह का संघर्ष

क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण राम शरण सिंह सहित आठ स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें बिहार शरीफ जिला जेल में लगभग 14 महीने तक कठोर कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। जेल जीवन उनके लिए परीक्षा का समय था, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

जेल में रहते हुए भी वे अन्य कैदियों को देशभक्ति, आत्मबल और नैतिकता का पाठ पढ़ाते थे। स्वतंत्रता के प्रति उनका समर्पण और दृढ़ संकल्प जेल की दीवारों में भी कमजोर नहीं पड़ा। यह दौर उनके जीवन को और अधिक मजबूत बनाकर बाहर लेकर आया।

आजादी के बाद समाजसेवा और शिक्षा में योगदान

जेल से रिहा होने के बाद भी राम शरण सिंह का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। देश आजाद तो हो गया था, लेकिन समाज में असमानता, गरीबी और शोषण जैसी समस्याएं बनी हुई थीं। उन्होंने अपना जीवन कमजोर और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।

वे शिक्षा के महत्व को भली-भांति समझते थे और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयासरत रहे। सामाजिक न्याय, समानता और नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण उनका सपना था।

सम्मान और पहचानः 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिला ताम्रपत्र सम्मान

भारत सरकार ने उनके अमूल्य योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया। यह सम्मान देश की आजादी के लिए किए गए त्याग और बलिदान की आधिकारिक मान्यता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें 25वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह सम्मान प्रदान किया।

हालांकि राम शरण सिंह ने कभी सम्मान या पद की लालसा नहीं रखी। उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार देश की आजादी और समाज की सेवा थी।

राम शरण सिंह का निधन और अमर विरासत

9 सितंबर 2006 को राम शरण सिंह का निधन हो गया, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और आदर्श आज भी जीवित हैं। हिलसा और नालंदा जिले में आज भी बुजुर्ग उनके किस्से गर्व से सुनाते हैं। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि एक शिक्षक, समाजसेवी और सच्चे राष्ट्रभक्त थे।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने स्वतंत्रता सेनानी

आज जब देश आजादी के अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है, ऐसे समय में राम शरण सिंह जैसे गुमनाम नायकों को याद करना और उनकी विरासत को आगे बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म और त्याग में होती है।

राम शरण सिंह का जीवन इतिहास के पन्नों में भले ही सीमित शब्दों में दर्ज हो, लेकिन उनकी कहानी हर उस भारतीय के दिल में जीवित रहनी चाहिए जो देश के लिए कुछ करने का सपना देखता है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Exit mobile version