Home धर्म-कर्म मघड़ा शीतला मंदिर में भगदड़ के बाद खुल रही व्यवस्था की परतें,...

मघड़ा शीतला मंदिर में भगदड़ के बाद खुल रही व्यवस्था की परतें, आस्था बना शेयर सिस्टम

Shareholder system temple Bihar religious news
Maghada Sheetla Temple Stampede: Inside the Management System and Controversy Over Offerings

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से करीब पांच किलोमीटर दूर पंचाने नदी के तट पर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मघड़ा शीतला मंदिर इन दिनों चर्चा के केंद्र में है।

हाल ही में मंदिर परिसर में हुई भगदड़ की घटना के बाद जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे मंदिर की व्यवस्थाओं, प्रबंधन प्रणाली और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी कई नई परतें सामने आने लगी हैं। स्थानीय लोग और प्रशासन दोनों ही इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल कर रहे हैं।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार भगदड़ की मुख्य वजह अत्यधिक भीड़ और कमजोर प्रबंधन व्यवस्था मानी जा रही है। मघड़ा के एक पांडेय परिवार के सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मंदिर के संचालन और पूजा-अर्चना के लिए वर्षों पहले  श्री शीतला संरक्षण पांडा कमेटी  का गठन किया गया था।

प्रारंभिक दौर में इस कमेटी में 12 सदस्य शामिल थे, जो सभी मघड़ा गांव के निवासी थे। ये सदस्य आपसी सहमति से पूजा की जिम्मेदारी तय करते थे, जिसे स्थानीय भाषा में “पाराबंदी” कहा जाता है।

भीड़ और चढ़ावे के साथ बदली व्यवस्थाः जैसे-जैसे समय के साथ मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई और श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हुई, वैसे-वैसे मंदिर में चढ़ावे की मात्रा भी बढ़ने लगी। बढ़ती भीड़ और आय को देखते हुए लगभग चार दशक पहले मंदिर प्रबंधन की संरचना में बड़ा बदलाव किया गया। उस समय 36 लोगों का एक समूह बनाया गया, जिसे स्थानीय लोग “शेयरहोल्डर समूह” के नाम से जानते हैं।

यह समूह मंदिर में पूजा-अर्चना, श्रद्धालुओं की भीड़ के नियंत्रण और चढ़ावा संग्रह जैसे कार्यों की जिम्मेदारी संभालने लगा। हालांकि समय के साथ यह व्यवस्था भी विस्तार पाती गई और अब इन शेयरहोल्डरों की संख्या बढ़कर एक हजार से अधिक बताई जा रही है।

चढ़ावे के बंटवारे को लेकर उठते सवालः सूत्रों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में शामिल कुछ लोग मंदिर संरक्षण के मूल उद्देश्य से भटक कर चढ़ावे से अधिक आय अर्जित करने पर ध्यान केंद्रित करने लगे हैं। आरोप यह भी है कि इस व्यवस्था के तहत शेयर की खरीद-बिक्री स्टांप पेपर पर गैरकानूनी तरीके से होने लगी है, जिससे मंदिर प्रबंधन का स्वरूप धीरे-धीरे व्यावसायिक रूप लेता चला गया।

जानकारी के अनुसार मंदिर से जुड़े प्रत्येक शेयरहोल्डर को प्रतिदिन कमेटी को लगभग 250 रुपये की निर्धारित राशि जमा करनी होती है। इसके बाद बचा हुआ चढ़ावा आपस में बांट लिया जाता है। वहीं मंदिर में स्थापित दान पेटी में आने वाली पूरी राशि कमेटी के पास ही रहती है, जिसका उपयोग मंदिर के रख-रखाव और अन्य आवश्यक खर्चों में किया जाता है।

मंदिर परिसर और बाहरी दुकानों की व्यवस्थाः मंदिर परिसर के भीतर करीब 12 दुकानों का संचालन पांडा कमेटी की देखरेख में होता है। इसके अलावा मंदिर के बाहर सैकड़ों अस्थायी और स्थायी दुकानें लगती हैं, जिनके संचालन के लिए नगर निगम प्रशासन हर वर्ष टेंडर प्रक्रिया आयोजित करता है। इस वर्ष इन दुकानों के संचालन का टेंडर करीब तीन लाख रुपये में हुआ है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के अनुपात में सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया। इसी वजह से बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान हादसे की आशंका बनी रहती है।

आस्था और इतिहास से जुड़ा है मघड़ाः मघड़ा गांव अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के लिए लंबे समय से प्रसिद्ध रहा है। यहां स्थित प्राचीन सिद्धपीठ माता शीतला मंदिर में चैत्र माह के प्रत्येक मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। इस दौरान बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

मघड़ा की महिमा केवल लोककथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भों में भी इसका उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग जब प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे, तब वे इस क्षेत्र में आकर नीम और पीपल के पेड़ों की छांव में विश्राम किया करते थे।

पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी दौरान उनके शरीर का एक हिस्सा और कंगन इस स्थान पर गिरा था। इसी घटना के कारण इस स्थल का नाम मघड़ा पड़ा।

बाद में राजा वृषकेतु को मिले दिव्य स्वप्न के आधार पर यहां खुदाई कराई गई, जिसमें मां की प्रतिमा प्रकट हुई। आज यह स्थल मिट्टी कुआं या मीठा कुआं के नाम से भी जाना जाता है।

जांच में जुटा प्रशासनः भगदड़ की घटना के बाद जिला प्रशासन मंदिर परिसर की व्यवस्थाओं और प्रबंधन प्रणाली की विस्तृत जांच कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा व्यवस्था और प्रबंधन प्रणाली में आवश्यक सुधार किए जाएंगे।

स्थानीय लोगों का मानना है कि आस्था के इस प्रमुख केंद्र में व्यवस्थाओं को पारदर्शी और व्यवस्थित बनाना समय की मांग है, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था भी सुरक्षित रहे और मंदिर की गरिमा भी बरकरार रहे।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Exit mobile version