नालंदाः यहां हर विधानसभा क्षेत्र की अपनी अलग राम कहानी, टूटेंगे कई तिलिस्म

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार की राजनीति का असली आईना अगर कहीं दिखता है तो वह है नालंदा जिला। यह जिला न केवल प्राचीन ज्ञान की भूमि है, बल्कि आधुनिक राजनीति की प्रयोगशाला भी। यहां सत्ता के गलियारों में कुछ नाम दशकों से जनता के भरोसे पर टिके हुए हैं तो कुछ सीटें बार-बार दल और चेहरे बदलकर नए समीकरण रचती रही हैं।

1994 में अस्थावां के तत्कालीन विधायक सतीश कुमार ने जब कुर्मी चेतना रैली की शुरुआत की थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यही आंदोलन आगे चलकर नीतीश कुमार जैसे दिग्गज नेता को जन्म देगा, जो नालंदा से निकलकर पूरे बिहार की राजनीति को नई दिशा प्रदान करेंगे।

वर्ष 2000 तक यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि चुनाव तय करती थी, लेकिन जब नीतीश कुमार ने विकास को राजनीति का केंद्रबिंदु बनाया तो जनता ने उम्मीदवार से ज्यादा पार्टी के सिंबल और नीतीश के नाम पर वोट देना शुरू कर दिया।

आज नालंदा जिले के सातों विधानसभा क्षेत्रों में ‘नीतीश फैक्टर’ एक अटूट सत्य बन चुका है। 2000 के बाद से जेडीयू-भाजपा गठबंधन का वर्चस्व कायम रहा है, जबकि कांग्रेस का प्रभाव 1980 के दशक के बाद लगभग समाप्त हो गया।

निर्दलीय उम्मीदवारों ने 70-80 के दशक में निर्णायक भूमिका निभाई, लेकिन अब पार्टियों की मजबूत पकड़ ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया है। श्रवण कुमार और सत्यदेव नारायण आर्य जैसे नेताओं ने स्थायी राजनीतिक स्थिरता प्रदान की। वहीं राजद ने हाल के वर्षों में हिलसा और इस्लामपुर जैसी सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत की है।

आइए, जिले की इन सात विधानसभा सीटों की रोचक राम कहानियों पर एक नजर डालें, जहां हर चुनाव में तिलिस्म टूटते और नए इतिहास रचे जाते हैं।

हिलसा विधानसभा: अप्रत्याशित मोड़ों वाली राजनीतिक जंग

हिलसा की राजनीति हमेशा से एक रहस्यमयी खेल की तरह रही है, जहां कभी भी बाजी पलट सकती है। यहां कांग्रेस, जेडीयू और राजद का पलड़ा बारी-बारी से भारी रहा है।

2000 से 2010 तक जेडीयू की उषा सिन्हा और रामचरित्र प्रसाद सिंह ने मजबूत पकड़ बनाई, लेकिन 2015 में राजद के शक्ति सिंह यादव ने चौंकाने वाली जीत दर्ज कर समीकरण बदल दिए।

2020 में जेडीयू के कृष्णमुरारी शरण ने महज 12 विवादित वोट से फिर सत्ता हासिल की, लेकिन हर चुनाव में नया विजेता उभरने की परंपरा ने हिलसा को ‘अनप्रेडिक्टेबल’ बना दिया है।

यहां की जनता विकास और जातीय समीकरणों के बीच झूलती रहती है,और आने वाले चुनावों में भी यही उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। क्या नीतीश फैक्टर फिर हावी होगा या राजद की लहर चलेगी? यह देखना रोचक होगा।

इस्लामपुर विधानसभा: उतार-चढ़ाव की अनंत कहानी

इस्लामपुर की राजनीति में उतार-चढ़ाव की ऐसी मिसाल मिलती है, जो शायद ही कहीं और देखने को मिले। 1952 से अब तक यहां कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समता पार्टी, जेडीयू और राजद सभी ने अपनी झंडा गाड़ा है।

1990 के दशक में कृष्ण बलभ प्रसाद (भाकपा) का दौर था, जिन्होंने वामपंथी विचारधारा को मजबूत आधार दिया। 2000 के बाद राम स्वरूप प्रसाद और प्रतिमा सिन्हा (जेडीयू) ने प्रभाव जमाया, लेकिन 2020 में राजद के राकेश कुमार रौशन ने सत्ता में शानदार वापसी की।

इस सीट की खासियत है कि यहां हर दशक में नया चेहरा और नया दल उभरता है। जातीय गठजोड़ और स्थानीय मुद्दे जैसे सिंचाई व रोजगार यहां चुनाव तय करते हैं। क्या इस्लामपुर फिर से कोई नया तिलिस्म तोड़ेगा?

नालंदा विधानसभा: श्रवण कुमार का अजेय किला

नालंदा सीट का नाम आज श्रवण कुमार के बिना अधूरा लगता है। 1995 से 2020 तक लगातार छह बार जीत दर्ज करने वाले यह जेडीयू नेता जिले की राजनीति का सबसे स्थिर और विश्वसनीय चेहरा हैं।

उनसे पहले यह सीट निर्दलीय और कांग्रेस उम्मीदवारों के बीच झूलती रही, लेकिन 1995 के बाद जनता ने सिर्फ एक नाम श्रवण कुमार पर भरोसा जताया। 25 सालों में छह चुनावों का यह रिकॉर्ड साबित करती है कि राजनीति में स्थिरता कैसे हासिल की जाती है। क्या यह किला आगे भी अजेय रहेगा? क्योंकि पिछले चुनाव में बतौर निर्दलीय कड़ी टक्कर देने वाले श्री कौशलेन्द्र कुमार उर्फ छोटे मुखिया इस बार कांग्रेस की महागठबंधन की नाव पर सवार हैं।

बिहारशरीफ विधानसभा: सुनील कुमार का विजय अभियान

बिहारशरीफ की राजनीति में सुनील कुमार का नाम एक योद्धा की तरह चमकता है। 2005 से अब तक उन्होंने पांच बार जीत दर्ज की है। पहले जेडीयू से, फिर भाजपा से। दल बदला, लेकिन जनता का भरोसा नहीं डिगा।

1950 से 1980 तक जहां कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा था, वहीं 2000 के बाद भाजपा-जेडीयू गठबंधन ने इसे एनडीए का मजबूत गढ़ बना दिया। यह सीट नालंदा जिले की शहरी राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है, जहां आधुनिकीकरण की लहर चल रही है।

अस्थावां विधानसभा: वफादारी और विरासत की मिसाल

अस्थावां की राजनीति वफादारी की कहानी है। 1980 से 2000 तक यहां रघुनाथ प्रसाद शर्मा का एकछत्र राज रहा, जिन्होंने कई बार निर्दलीय के रूप में जीत हासिल की। उनके नाम से पटना में सड़कें और मोहल्ले बसे, और उन्होंने बिहार-झारखंड में दर्जनों शैक्षणिक संस्थान स्थापित किए।

2005 के बाद यह सीट जेडीयू के जितेंद्र कुमार के पास चली गई, जो लगातार चार बार जीत चुके हैं। यहां की जनता ने हमेशा स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता दी है और कुर्मी चेतना का उद्गम स्थल होने के कारण नीतीश कुमार का प्रभाव मजबूत है। अस्थावां साबित करता है कि राजनीति में विरासत कैसे नई पीढ़ी को सौंपी जाती है।

हरनौत विधानसभा: नीतीश कुमार की राजनीतिक पाठशाला

हरनौत को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक जन्मभूमि माना जाता है। 1985 में लोकदल से पहली जीत 1995 में समता पार्टी से दूसरी। यहीं से उन्होंने संघर्ष, जनसंपर्क और विकास की राजनीति का सबक सीखा। आज यह सीट जेडीयू का मजबूत गढ़ है, जहां ‘सुशासन बाबू’ की यात्रा की नींव पड़ी।

हरनौत ने बिहार को एक मुख्यमंत्री दिया और यहां की जनता आज भी नीतीश के नाम पर वोट करती है। ग्रामीण विकास, सिंचाई और रोजगार जैसे मुद्दे यहां चुनाव तय करते हैं। क्या हरनौत फिर से कोई नया नेता उभारेगा?

राजगीर विधानसभा: सत्यदेव नारायण आर्य का अमर युग

राजगीर का नाम सुनते ही सत्यदेव नारायण आर्य की याद ताजा हो जाती है, जिन्होंने 1977 से 2010 तक लगातार सात बार जीत दर्ज की। भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे आर्य बाद में हरियाणा के राज्यपाल भी बने। अभी उनके बेटे कौशल किशोर जदयू से निवर्तमान विधायक हैं।

उनके बाद जेडीयू उम्मीदवारों ने सीट संभाली, लेकिन राजगीर में आज भी ‘आर्य युग’ की गूंज सुनाई देती है। पर्यटन, धार्मिक स्थलों का विकास और कृषि यहां के मुख्य मुद्दे हैं। सत्यदेव आर्य की यह कहानी राजनीति में दीर्घकालिक प्रभाव की मिसाल है।

बहरहाल नालंदा की इन सात सीटों की राम कहानियां बताती हैं कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं सिवाय जनता के भरोसे के। आने वाले चुनावों में नीतीश फैक्टर, राजद की चुनौती और एनडीए की एकजुटता कई तिलिस्म तोड़ सकती है। क्या नालंदा फिर से बिहार की राजनीति को नई दिशा देगा? यह तो चुनाव परिणाम ही समय बताएगा।

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