राजगीर (नालंदा दर्पण)। प्राचीन इतिहास, आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध राजगीर के गर्मजल कुंड आज एक गंभीर पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। एक समय था जब यहां के गर्म पानी के झरनों की गर्जना आधा किलोमीटर दूर तक सुनाई देती थी। झरनों से गिरते गर्म पानी की प्रबल धारा की आवाज गौरक्षिणी क्षेत्र के आसपास तक साफ सुनाई पड़ती थी।
लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आज कुंडों के पास पहुंचने पर भी झरनों की कलकल करती आवाज सुनाई नहीं देती। केवल आंखों से देखने पर ही यह अहसास होता है कि कहीं हल्की धार के रूप में पानी गिर रहा है। पहले जहां मोटी और प्रबल धारा बहती थी, वहीं अब झरनों की धारा बेहद पतली हो चुकी है।
कई कुंडों के झरने तो पूरी तरह सूखने की कगार पर हैं। यह बदलाव केवल प्राकृतिक दृश्य का परिवर्तन नहीं, बल्कि राजगीर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए भी खतरे की घंटी माना जा रहा है।
सदियों पुरानी पहचान पर संकटः राजगीर प्राचीन काल से ही अपने गर्मजल कुंडों और प्राकृतिक झरनों के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है। यहां के ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, गंगा-यमुना कुंड, अनंत ऋषि कुंड, मार्कण्डेय कुंड और व्यास कुंड जैसे कई पवित्र स्थल धार्मिक, सांस्कृतिक और चिकित्सीय दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं।
मान्यता है कि इन कुंडों के गर्मजल में स्नान करने से त्वचा रोग, पेट संबंधी समस्याओं और कई शारीरिक कष्टों से राहत मिलती है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचकर स्नान करते हैं और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
एक समय ऐसा भी था जब स्कूलों की सामान्य ज्ञान की किताबों में राजगीर की पहचान गर्मजल के कुंडों और झरनों के रूप में ही बताई जाती थी। बच्चों से पूछा जाता था कि राजगीर किस लिए प्रसिद्ध है? तो उनका सीधा उत्तर होता था गर्मजल के कुंड और झरने।
लगातार कमजोर हो रही झरनों की धारः पिछले कुछ वर्षों से झरनों की जलधारा लगातार कमजोर पड़ती जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार पहले झरनों से लगातार तेज गति से गर्म पानी गिरता था, जिसकी आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती थी। लेकिन अब पानी की मात्रा काफी कम हो चुकी है।
कई स्थानों पर झरनों की धार इतनी पतली हो गई है कि उसका अस्तित्व केवल प्रतीकात्मक रह गया है। इससे न केवल धार्मिक आस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि राजगीर के पर्यटन उद्योग पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारणों की आशंकाः विशेषज्ञों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें भू-जल स्तर में लगातार गिरावट, प्राकृतिक जलस्रोतों का अवरुद्ध होना, आसपास के क्षेत्रों में बढ़ता अनियंत्रित निर्माण, डीप बोरिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय कारक शामिल हैं।
यदि इन कारणों की वैज्ञानिक जांच कर समय रहते समाधान नहीं खोजा गया, तो आने वाले वर्षों में राजगीर के कई ऐतिहासिक कुंड और झरने पूरी तरह समाप्त भी हो सकते हैं।
स्थानीय लोगों ने उठाई संरक्षण की मांगः इस गंभीर स्थिति को लेकर स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने चिंता व्यक्त की है। प्रकृति के अध्यक्ष नवेन्दु झा, मुखिया प्रतिनिधि पंकज कुमार, वार्ड पार्षद डॉ. अनिल कुमार, पूर्व प्रमुख सुधीर कुमार पटेल, मुखिया प्रतिनिधि बागीश भूषण समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से इस दिशा में तत्काल कदम उठाने की मांग की है।
उनका कहना है कि राजगीर के गर्मजल कुंड केवल धार्मिक स्थल ही नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इनका संरक्षण केवल पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।
समय रहते पहल जरूरीः विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इन प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए ठोस योजना नहीं बनाते हैं, तो राजगीर की पहचान रहे ये गर्मजल झरने धीरे-धीरे समाप्त हो सकते हैं।
जरूरत इस बात की है कि जलस्रोतों की वैज्ञानिक जांच, भू-जल प्रबंधन, अनियंत्रित निर्माण पर नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण के उपायों को प्राथमिकता दी जाए। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब राजगीर के ये प्रसिद्ध गर्मजल झरने केवल इतिहास की किताबों और स्मृतियों में ही दर्ज रह जाएंगे और उनकी गूंजती आवाजें केवल अतीत की कहानी बनकर रह जाएंगी। समाचार स्रोतः नालंदा दर्पण डेस्क/मुकेश भारतीय









