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एक अनसुलझी समस्या से जूझ रहा है गांवो के ऐसे सरकारी स्कूल!

हिलसा (नालंदा दर्पण)। चंडी प्रखंड मुख्यालय से मात्र 600 मीटर की दूरी पर स्थित दस्तूरपर गांव का प्राथमिक विद्यालय (सरकारी स्कूल) पिछले छह वर्षों से एक अनसुलझी समस्या से जूझ रहा है। वर्ष 2019 से यह विद्यालय अपने जर्जर भवन के कारण योगिया प्राथमिक विद्यालय के दो कमरों में उधार की जगह पर संचालित हो रहा है।

इस छोटे से स्थान में न केवल दस्तूरपर, बल्कि योगिया विद्यालय के छात्र भी एक साथ पढ़ाई कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है।

दस्तूरपर प्राथमिक विद्यालय में कक्षा एक से पांच तक कुल 11 छात्र हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए तीन शिक्षक नियुक्त हैं। दूसरी ओर योगिया विद्यालय के अपने छात्र भी हैं। दोनों स्कूलों के लिए केवल दो कमरे उपलब्ध हैं, जिसके कारण कक्षाएँ एक साथ चलाई जाती हैं।

एक कमरे में दो अलग-अलग कक्षाओं की पढ़ाई एक साथ होती है, जिससे शिक्षकों और छात्रों दोनों के लिए ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दोनों स्कूलों के बच्चों को एक साथ पढ़ाना चुनौतीपूर्ण है। संसाधनों की कमी के कारण हम पूरी तरह से पाठ्यक्रम को कवर नहीं कर पाते।

विद्यालय तक पहुँचने का रास्ता भी बच्चों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। पक्की सड़क के अभाव में छात्रों को खेतों के बीच कीचड़ भरे रास्तों और आरी से होकर गुजरना पड़ता है। बरसात के मौसम में यह रास्ता और भी दुर्गम हो जाता है, जिसके कारण कई बच्चे स्कूल नहीं आ पाते। इसके अलावा विद्यालय में बिजली, पंखे और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि कई बार प्रशासन को इस समस्या से अवगत कराया गया। लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। एक अभिभावक रामू प्रसाद ने कहा कि हमारे बच्चे भविष्य हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं है। सरकार को चाहिए कि नया भवन बनाए और रास्ते को पक्का करे।

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि भवन निर्माण के लिए प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन बजट और मंजूरी में देरी के कारण काम शुरू नहीं हो सका।

दस्तूरपर विद्यालय की स्थिति को सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। सरकार की सर्व शिक्षा अभियान और समग्र शिक्षा जैसी योजनाओं के तहत नए भवन का निर्माण और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इसके अलावा स्थानीय समुदाय और गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी से अस्थायी सुविधाएं जैसे टेंट, पंखे और पानी की व्यवस्था की जा सकती है।

यह स्थिति केवल दस्तूरपर की नहीं, बल्कि नालंदा के कई ग्रामीण विद्यालयों की हकीकत को दर्शाती है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो ग्रामीण भारत के बच्चों का भविष्य अधर में लटक सकता है। प्रशासन और समाज को मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे ताकि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार मिल सके।

Nalanda Darpan

नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके। More »

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