Harishankar Parsai Thoughts
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व्यंग्य और आलोचना: डंक या संजीवनी?
✍️ नालंदा दर्पण / मुकेश भारतीय। व्यंग्य और आलोचना का यदि कोई आधिकारिक गूढ़ अर्थ निकालें तो वह समाज का दर्पण नहीं, बल्कि एक्स-रे मशीन होना चाहिए। जो भीतर तक झांककर सच्चाई को उजागर कर सके। पर समस्या यह है कि आजकल व्यंग्य के नाम पर चल रही कलम ज़्यादातर काजल…
