
राजगीर (नालंदा दर्पण)। राजगीर विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। आजादी बाद शुरुआती दौर में इस सीट पर कांग्रेस का मजबूत दबदबा था। कई वर्षों तक कांग्रेस ने इस क्षेत्र में लगातार जीत दर्ज की और जनसमर्थन बनाए रखा। लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं। कांग्रेस को पहली बार जनसंघ ने कड़ी टक्कर देते हुए पराजित किया। इसके बाद जनसंघ के यदुनंदन जी का वर्चस्व दो चुनाव तक कायम रहा।
वामपंथी विचारधारा से प्रभावित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने जनसंघ को हराकर इस सीट पर अपनी पकड़ बनाई। सीपीआई के चन्द्रदेव प्रसाद हिमांशु ने भी दो चुनाव यानी एक दशक तक राजगीर में अपनी पैठ बनाए रखी। लेकिन धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उभार के साथ परिस्थितियाँ फिर बदलीं। भाजपा ने अपनी संगठनात्मक मजबूती और हिंदुत्व की राजनीति के सहारे इस सीट को कम्युनिस्टों से छीन लिया और राजगीर को अपनी पारंपरिक सीट बना लिया।
भाजपा का यह वर्चस्व लंबे समय तक कायम रहा। सत्यदेव नारायण आर्य यहां से आठ बार विधायक चुने गए, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। किंतु बिहार की राजनीति में जब क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने लगा, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल (यूनाइटेड) ने 2015 में धीरे-धीरे इस सीट पर अपना दबदबा स्थापित कर लिया। जदयू ने लगातार दो बार इस सीट से जीत हासिल कर यह साबित किया कि वह स्थानीय स्तर पर मजबूत हो चुकी है।
इस बार भी जदयू चुनावी तैयारी में जुटी थी। सिटिंग विधायक कौशल किशोर द्वारा नाजिर रसीद भी कटाया गया था। लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण एक बार फिर बदल गया है। भाजपा के नेता और कार्यकर्ता जदयू से यह सीट छीनने के लिए लगातार संघर्ष और दावा करते रहे, लेकिन उन्हें कोई खास कामयाबी हासिल नहीं हुई। इस बार तो एक अनहोनी घटना हुई, जिसकी कल्पना भी राजगीर विधानसभा क्षेत्र के लोगों ने कभी नहीं की थी।
लोजपा (रामविलास) की चौंकाने वाली एंट्री? राजगीर सीट इस बार एनडीए गठबंधन के सीट बंटवारे में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) [LJP (R)] के खाते में चली गई है। जदयू और भाजपा के इस पारंपरिक गढ़ में लोजपा ने पहली बार एंट्री मारकर सबको चौंका दिया है। यह सीट न तो जदयू के पास रही और न ही भाजपा के पास। जदयू और भाजपा के बीच खींचतान का फायदा उठाते हुए लोजपा ने बाजी मार ली।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि लोजपा अपने प्रत्याशी को राजगीर विधानसभा क्षेत्र या नालंदा जिले के भीतर से उतारेगी या फिर बाहर से किसी नेता को आयात करेगी। लेकिन इतना निश्चित है कि इस बदलाव से राजगीर का चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा। भाजपा और जदयू के पारंपरिक मतदाताओं का बिखराव लोजपा की रणनीति और उम्मीदवार के चयन पर निर्भर करेगा।
क्या कहते हैं स्थानीय लोग? स्थानीय मतदाताओं में इस अप्रत्याशित बदलाव को लेकर उत्सुकता और चर्चा का माहौल है। कुछ लोग इसे नए राजनीतिक प्रयोग के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि लोजपा को इस सीट पर अपनी साख साबित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। राजगीर की जनता हमेशा से उन नेताओं को पसंद करती है, जो स्थानीय मुद्दों को समझें और क्षेत्र के विकास के लिए काम करें।
चुनावी रणनीति और संभावनाएँ? लोजपा के लिए यह एक सुनहरा अवसर है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। पार्टी को न केवल जदयू और भाजपा के मजबूत वोट बैंक से मुकाबला करना होगा, बल्कि विपक्षी दलों जैसे राजद और कांग्रेस के गठबंधन को भी टक्कर देनी होगी।
लोजपा का उम्मीदवार कौन होगा, यह एक बड़ा सवाल है। यदि पार्टी स्थानीय और जमीनी स्तर के नेता को मैदान में उतारती है तो उसे मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है। वहीं, यदि बाहरी उम्मीदवार को चुना गया तो स्थानीय असंतोष की संभावना भी बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर आसन्न 2025 का राजगीर विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित मोड़ लेने वाला है। लोजपा की इस नई एंट्री ने न केवल भाजपा और जदयू के लिए चुनौती खड़ी की है, बल्कि पूरे क्षेत्र की सियासत में एक नया रंग भर दिया है। अब देखना यह है कि क्या लोजपा इस मौके को भुना पाएगी या फिर पारंपरिक दल अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर लेंगे।







