अधर में लटका राजगीर अनुमंडलीय व्यवहार न्यायालय का इंतजार, जानें बड़ी वजह

राजगीर (नालंदा दर्पण)। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक राजगीर कभी विश्व की प्राचीनतम नालंदा विश्वविद्यालय का गौरव रहा है, लेकिन आज एक अदद बुनियादी आवश्यकता अनुमंडलीय व्यवहार न्यायालय के लिए तीन दशकों से अधिक समय से प्रतीक्षा कर रहा है। यह लंबी प्रतीक्षा न केवल प्रशासनिक सुस्ती को दर्शाती है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए न्याय की सुलभता को भी एक दूर का सपना बनाए हुए है।
राजगीर में अनुमंडल गठन के 32 साल बीत चुके हैं, लेकिन व्यवहार न्यायालय की स्थापना का सपना अभी भी अधर में लटका है। इस साल जनवरी में, इस दिशा में एक उम्मीद जगी, जब राजगीर के आयुध निर्माणी बायपास रोड पर दरियापुर और पंडितपुर मौजा में 6 एकड़ 25 डिसमिल जमीन का अधिग्रहण किया गया। इसमें 39 रैयतों की निजी जमीन और 0.32 एकड़ सरकारी भूमि शामिल है।
जिला प्रशासन ने मुआवजा वितरण के लिए कैंप आयोजित किए और दरियापुर मौजा के 28 और पंडितपुर मौजा के 11 किसानों को मुआवजा वितरित किया गया। लेकिन 15 खेसरों की वकास्त भूमि के रैयतों को अभी तक मुआवजा नहीं मिल सका है। क्योंकि उनके मामले भूमि सुधार उपसमाहर्ता राजगीर की अदालत में लंबित हैं।
जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने इस मुद्दे के त्वरित निपटारे के निर्देश दिए थे और छह महीने पहले वकास्त जमीन को रैयतीकरण करने का आदेश भी जारी किया गया था। फिर भी रैयतीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। प्रभावित किसानों में इस देरी को लेकर गहरा रोष व्याप्त है।
यह स्थिति तब और निराशाजनक हो जाती है, जब यह देखा जाता है कि भूमि अधिग्रहण के बाद भी न तो निर्माण कार्य शुरू हुआ है और न ही भवन की आधारशिला रखी गई है।
राजगीर में अनुमंडलीय व्यवहार न्यायालय की अनुपस्थिति के कारण हजारों स्थानीय निवासियों को अपने मामलों की सुनवाई के लिए जिला मुख्यालय बिहारशरीफ का रुख करना पड़ता है। यह न केवल समय और धन की बर्बादी है, बल्कि कई बार आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए न्याय की राह को और कठिन बना देता है।
अब प्रशासन के पास मौका है कि वह इस लंबित मुद्दे का त्वरित निपटारा करे। वकास्त भूमि के रैयतों के मुआवजे का भुगतान और रैयतीकरण की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही न्यायालय भवन के निर्माण के लिए एक निश्चित समयसीमा तय की जानी चाहिए, ताकि 32 वर्षों की प्रतीक्षा का अंत हो सके।





