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नालंदा में इको-पर्यटन कॉरिडोर: रोजगार, संरत्क्षण और जैव विविधता का अनूठा संगम

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। क्या आपने कभी सोचा है कि नालंदा की गिद्धी झील (कमल सरोवर) और पुष्पकारिणी झील केवल जलाशय नहीं, बल्कि जैव विविधता के अनमोल रत्न और स्थानीय समुदायों के लिए आर्थिक समृद्धि का स्रोत हो सकती हैं? वन विभाग नालंदा प्रमंडल ने इन दोनों आर्द्रभूमियों के संरक्षण, पुनर्जनन और इको-पर्यटन के रूप में विकास के लिए एक अभूतपूर्व पहल शुरू की है। यह कदम न केवल प्रकृति के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर है, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोलेगा।

पिछले तीन वर्षों से गिद्धी झील और पुष्पकारिणी झील में आयोजित एशियन वॉटरबर्ड सेंसस ने इन स्थलों की समृद्ध जैव विविधता को उजागर किया है। 2024 की गणना के अनुसार गिद्धी झील में 34 प्रजातियों के 434 पक्षी और पुष्पकारिणी झील में 38 प्रजातियों के 633 पक्षी दर्ज किए गए। इनमें मध्य एशिया, साइबेरिया और मंगोलिया से आने वाले प्रवासी पक्षी शामिल हैं। जैसे कि फेरुजिनस डक, पेंटेड स्टॉर्क और ब्लैक हेडेड आइबिस वैश्विक रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों में गिने जाते हैं।

वन विभाग ने इन झीलों को वेटलैंड्स (संरक्षण और प्रबंधन) नियम 2017 के तहत अधिसूचित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके लिए भूमि को राजस्व विभाग से वन विभाग को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। प्रख्यात वन्यजीव और पक्षी विशेषज्ञ राहुल कुमारने इन आर्द्रभूमियों के लिए एक रणनीतिक संरक्षण योजना तैयार की है। इस योजना में स्थानीय समुदायों, शोधकर्ताओं और पक्षी प्रेमियों का सहयोग शामिल है।

इन झीलों को इको-पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना में स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर गाइड, संरक्षण कार्यकर्ता और पर्यटन व्यवसायी के रूप में तैयार किया जाएगा। यह न केवल बेरोजगारी को कम करेगा, बल्कि नालंदा को एक प्रमुख इको-पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करेगा। वन प्रमंडल पदाधिकारी, नालंदा ने पक्षी गणना, निगरानी और सरकारी प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई है।

यह पहल नालंदा की जैव विविधता, संस्कृति और सतत विकास को एक नई दिशा देगी। इन झीलों का संरक्षण न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा, बल्कि पर्यटकों को आकर्षित करके स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। यह एक ऐसा मॉडल है, जो प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को दर्शाता है।

बहरहाल, गिद्धी झील और पुष्पकारिणी झील नालंदा के लिए केवल जलाशय नहीं, बल्कि एक नई संभावना का प्रतीक हैं। यह पहल हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं। क्या हम केवल उनका दोहन करेंगे या उन्हें संरक्षित करते हुए अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध विरासत छोड़ेंगे?

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