बेन: इस गांव में सात निश्चय योजना के विकास की हालत देखिए

बेन (नालंदा दर्पण)। बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजना के तहत प्रत्येक गांव की गलियों को पक्का करने का वादा किया गया था, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की नई इबारत लिखी जा सके। इस योजना के तहत गलियों का पक्कीकरण, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन बेन प्रखंड के खैरा पंचायत अंतर्गत मखदूमपुर गांव में यह योजना एक दशक बाद भी धरातल पर उतरती नहीं दिख रही है। ग्रामीणों की शिकायतें और उनकी समस्याएं स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता को उजागर करती हैं।
मखदूमपुर गांव के सुरेंद्र प्रसाद सिंह, पिंकु कुमार, मुनेश्वर प्रसाद, प्रियदर्शी अभिमन्यु और अन्य ने बताया कि उनकी गलियां आज भी कच्ची और कीचड़ से भरी हैं। बरसात के दिनों में स्थिति और बदतर हो जाती है, जब बच्चे घुटनों तक कीचड़ में डूबकर स्कूल जाने को मजबूर होते हैं। गांव का मुख्य मार्ग से संपर्क केवल 200 मीटर की दूरी पर है, लेकिन यह रास्ता खेतों के बीच से होकर गुजरता है, जो बरसात में दलदल बन जाता है।
ग्रामीणों ने बताया कि गलियों में नालियों का निर्माण नहीं हुआ है, और जहां नालियां हैं, वहां सफाई का अभाव है। घरों और शौचालयों से निकलने वाला गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है, जिससे दुर्गंध और मच्छरों का प्रकोप बढ़ता है।
यह स्थिति न केवल अस्वच्छता को बढ़ावा दे रही है, बल्कि डेंगू और डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा भी पैदा कर रही है। ग्रामीण रामजी वर्मा और संतोष शाव ने कहा कि बरसात में घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। रिश्तेदार भी गांव आने से कतराते हैं, जिससे हमें हीनता की भावना महसूस होती है।
सात निश्चय योजना के तहत गलियों के पक्कीकरण का कार्य शुरू तो हुआ, लेकिन मखदूमपुर में यह योजना पूरी तरह से उपेक्षित रही। ग्रामीणों के अनुसार दो दशक पहले गलियों में ईंट सोलिंग की गई थी, जो अब पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। वर्तमान मुखिया और पंचायत प्रतिनिधियों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
नित्यानंद प्रसाद और दिलीप कुमार ने बताया कि पीसीसी ढलाई और नालियों के निर्माण जैसे बुनियादी कार्यों की अनदेखी की गई है।
इसके अलावा 9 लाख 9 हजार रुपये की लागत से बनाया गया आंगनबाड़ी केंद्र भी आधा-अधूरा छोड़ दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि इस राशि का बंदरबांट कर लिया गया, और केंद्र आज भी उपयोग के लिए अनुपयुक्त है।
स्वच्छ भारत अभियान के तहत गांवों में स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। लेकिन मखदूमपुर में यह अभियान केवल कागजी दिखावा बनकर रह गया है। अप्रैल 2025 में सांसद और ग्रामीण विकास मंत्री द्वारा उद्घाटित W.P.U. (कचरा प्रबंधन केंद्र) भी अपनी बदहाली की कहानी कह रहा है।
ग्रामीणों ने बताया कि इस केंद्र की छत से बरसात में पानी टपकता है और न तो घर-घर डस्टबिन उपलब्ध कराए गए हैं, न ही कचरा उठाने की कोई व्यवस्था है।
नालियों की सफाई न होने के कारण जलभराव और कचरे का जमावड़ा आम बात है। सात निश्चय योजना के तहत बिछाई गई पाइपलाइन भी नालियों के बीच में बिछाई गई है, जो पानी की निकासी में बाधा बन रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह पाइपलाइन तीन फीट जमीन के नीचे बिछाने का प्रावधान था, लेकिन इस नियम की अनदेखी की गई।
गांव की सबसे बड़ी समस्या बच्चों की शिक्षा से जुड़ी है। बरसात के दिनों में कीचड़ और जलभराव के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव के स्कूल में केवल दो कमरे हैं, जबकि नौ शिक्षकों की नियुक्ति है। हैरानी की बात यह है कि एक ही परिवार के चार शिक्षक इस स्कूल में तैनात हैं, जिसे ग्रामीण अनुचित मानते हैं।
मखदूमपुर गांव की स्थिति ग्रामीण विकास के सरकारी दावों की पोल खोल रही है। स्वच्छ और सुंदर गांव बनाने का सपना यहां की बदहाल गलियों और गंदगी के बीच दम तोड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि गंभीरता से इस दिशा में काम करें।
क्या यह गांव कभी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो पाएगा? क्या ग्रामीणों की पुकार सुनी जाएगी? ये सवाल न केवल मखदूमपुर, बल्कि नालंदा के उन तमाम गांवों के लिए प्रासंगिक हैं, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।





