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ऐतिहासिक रहा भूटान के प्रधानमंत्री का नालंदा विश्वविद्यालय दौरा

राजगीर (नालंदा दर्पण)। नालंदा विश्वविद्यालय ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया, जब भूटान के प्रधानमंत्री दशो शेरिंग टोबगे अपनी धर्मपत्नी और एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय का दौरा किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में उत्साह और आत्मीयता का माहौल रहा, जिसमें कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने मेहमानों का हार्दिक स्वागत किया और इस दौरे को एक ऐतिहासिक क्षण बताया।

इस दौरे के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय ने भूटान के प्रधानमंत्री और विद्यार्थियों के बीच एक संवादात्मक सत्र का आयोजन किया, जिसमें 50 से अधिक प्रश्न प्राप्त हुए। चयनित प्रश्नों पर प्रधानमंत्री ने उत्साह और आत्मीयता के साथ जवाब दिए, जिससे विद्यार्थियों को वैश्विक नेतृत्व और भूटान की अनूठी दर्शनशास्त्र से सीखने का अवसर मिला। यह सत्र नालंदा की प्राचीन परंपरा को दर्शाता है, जहाँ ज्ञान का आदान-प्रदान और संवाद शिक्षा का मूल रहा है।

कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में नालंदा विश्वविद्यालय के एकत्व दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह दर्शन प्रकृति के साथ सामंजस्य, विकास और स्थिरता के बीच संतुलन, तथा शांति और संघर्ष-रहित सहअस्तित्व को बढ़ावा देता

प्रो. चतुर्वेदी ने भूटान के सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता  (Gross National Happiness) दर्शन को नालंदा की शैक्षणिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा बताया। उन्होंने भूटान की माइंडफुलनेस सिटी  पहल की तुलना नालंदा की ध्यान-आधारित शिक्षा परंपरा से की, जो शांति, ज्ञान और पारिस्थितिक चेतना का प्रतीक है। नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि शांति और ज्ञान का जीवंत प्रतीक है, जो भूटान के दर्शन के साथ गहराई से मेल खाता है।

भूटान के प्रधानमंत्री दशो शेरिंग टोबगे ने नालंदा और राजगीर की अपनी यात्रा पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने भारत सरकार, बिहार सरकार और नालंदा विश्वविद्यालय के स्नेहपूर्ण आतिथ्य के लिए आभार व्यक्त किया।

अपने उद्बोधन में उन्होंने नालंदा के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित किया, जिसमें उन्होंने बताया कि अल-अजहर, बोलोनिया, ऑक्सफोर्ड और पेरिस जैसे विश्वविद्यालयों से बहुत पहले नालंदा महाविहार लगभग दो सहस्राब्दियों तक विश्व का प्रमुख शिक्षा केंद्र रहा।

प्रधानमंत्री ने नालंदा को न केवल एक विश्वविद्यालय, बल्कि विद्या और अध्यात्म का नगर बताया, जहाँ दस हजार से अधिक छात्र और विद्वान अध्ययन-अध्यापन में संलग्न थे।

उन्होंने वर्तमान नालंदा विश्वविद्यालय को उसी गौरवशाली परंपरा का संवाहक माना और छात्रवृत्ति, शैक्षणिक आदान-प्रदान, तथा सांस्कृतिक साझेदारी को मजबूत करने पर बल दिया।

प्रधानमंत्री ने नालंदा विश्वविद्यालय को भूटान में नवंबर 2025 में आयोजित होने वाले वैश्विक शांति प्रार्थना महोत्सव में भाग लेने का निमंत्रण दिया। उन्होंने नालंदा को शांति, एकता और अध्यात्म का शाश्वत दीपस्तंभ बताया, जो आज भी दुनिया को प्रेरित करता है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भूटान विश्व का एकमात्र वज्रयान बौद्ध देश होने के नाते नालंदा की ऐतिहासिक भूमिका से गहरे रूप से प्रभावित है। नालंदा ने हमारी परंपराओं को आकार देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भविष्य में नालंदा और भूटान का सहयोग इस बंधन को और प्रगाढ़ बनाएगा।

प्रधानमंत्री की यात्रा का समापन विद्यार्थियों के साथ एक संवाद सत्र के साथ हुआ, जिसने नालंदा की ज्ञान और वैश्विक आदान-प्रदान की परंपरा को पुनर्जनन किया। यह दौरा न केवल नालंदा विश्वविद्यालय की वैश्विक पहचान को मजबूत करता है, बल्कि भारत और भूटान के बीच सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग को भी नई ऊँचाइयों पर ले जाता है।

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