मुहाने, पैमार, सकरी और पंचाने नदियों पर अतिक्रमण किसानों के लिए बनी मुसीबत

नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिले में पंचाने, पैमार, सकरी और मुहाने जैसी सुरसर नदियां कभी इस क्षेत्र के गांवों और किसानों के लिए जीवन रेखा मानी जाती थी। इन्हीं नदियों के जल से खेतों की सिंचाई होती थी। पशुपालन को संबल मिलता था। ग्रामीण जीवन की अर्थव्यवस्था चलती थी।
लेकिन आज यही नदियां अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। गाद, गंदगी, अतिक्रमण और घोर उपेक्षा ने इन्हें इस कदर जर्जर कर दिया है कि अब ये जीवन रेखा कहलाने लायक नहीं बची हैं। दसकों से इन नदियों की सफाई की जगह नदी के जान बालू का उत्खनन बेखौफ हुआ है।
नतीजतन नदी तल में भारी मात्रा में गाद जम गयी है। इससे जलधारा सिकुड़ती जा रही है। कई स्थानों पर तो नदियों का प्राकृतिक प्रवाह ही बाधित हो गया है। दूसरी ओर नदी किनारे अतिक्रमण तेजी से बढ़ा है। खेतों का विस्तार, भवनों का निर्माण और कचरा डंपिंग ने नदियों की चौड़ाई और गहराई दोनों को प्रभावित किया है।
नदियों में घरेलू कचरा, प्लास्टिक और गंदा पानी लगातार गिराया जा रहा है, जिससे प्रदूषण भी गंभीर समस्या बन गया है। इन हालातों का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। कभी जिन नदियों से रबी और खरीफ दोनों फसलों की सिंचाई आसानी से हो जाती थी।
आज वहीं नदियां खेतों तक पानी पहुंचाने में पूरी तरह असफल साबित हो रही है। सिंचाई के अभाव में किसानों को निजी बोरिंग और डीजल पंप पर निर्भर होना पड़ रहा है। इससे उनकी लागत बढ़ रही है। खेती लाभ का सौदा नहीं रह गई है। इससे छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं, जिनके पास वैकल्पिक संसाधन सीमित हैं।
पैमार नदी का उदाहरण इस उपेक्षा की कहानी को साफ बयां करता है। कभी इस नदी में सरकार द्वारा करोड़ों खर्च कर दर्जनों लिफ्ट इरीगेशन सिस्टम का इजाद किया गया था। इससे आसपास के सैकड़ों एकड़ खेतों को पानी मिलता था।
यह व्यवस्था किसानों के लिए वरदान साबित हुई थी। लेकिन आज यह सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। न तो इसकी मरम्मत हुई और न ही इसे दोबारा चालू करने की कोई ठोस पहल की गई।
परिणामस्वरूप वह योजना कागजों में सिमटकर रह गई। अब तो लोगों के दिल दिमाग में यह केवल इतिहास जैसा है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इन नदियों की दुर्दशा के बावजूद शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर गंभीरता से नहीं गया है। योजनाओं और घोषणाओं की कमी नहीं है, लेकिन जमीनी स्तर पर अमल न के बराबर है।
यदि समय रहते इन नदियों का पुनर्जीवन, अतिक्रमण हटाने, नियमित सफाई और आधुनिक सिंचाई व्यवस्था पर काम नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में ये नदियां पूरी तरह अस्तित्व हीन हो जायेगी। इससे न केवल खेती प्रभावित होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन पर गहरा संकट खड़ा हो जायेगा।





