नव नालंदा महाविहार में गूंजा भारत-मंगोलिया मैत्री का स्वर, डैम्बजाव का विशेष व्याख्यान
राजगीर में भारत और मंगोलिया के द्विपक्षीय सहयोग पर केंद्रित बुद्धिजीवी कार्यक्रम, शिक्षा, पर्यटन और आर्थिक संभावनाओं पर जोर।

राजगीर (नालंदा दर्पण)। प्राचीन ज्ञानभूमि राजगीर स्थित नव नालंदा महाविहार में भारत और मंगोलिया के ऐतिहासिक एवं समकालीन संबंधों पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भारत में मंगोलिया के राजदूत गैं बोल्ड डैम्बजाव ने दोनों देशों के बहुआयामी रिश्तों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं बौद्ध वंदना के साथ हुआ। अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीकांत सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि नालंदा की धरती पर भारत-मंगोलिया संबंधों पर संवाद अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है।
साझा बौद्ध विरासत आध्यात्मिक बंधन की आधारशिलाः अपने व्याख्यान में राजदूत डैम्बजाव ने भारत और मंगोलिया को आध्यात्मिक भाई बताते हुए कहा कि नालंदा की ज्ञान परंपरा दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत आधारशिला है।
उन्होंने मंगोलिया की संयुक्त राष्ट्र सदस्यता में भारत की निर्णायक भूमिका का उल्लेख करते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व की सराहना की।
राजदूत ने वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंगोलिया यात्रा को द्विपक्षीय संबंधों में “नए अध्याय की शुरुआत” बताया। उन्होंने कहा कि इस यात्रा ने राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग को नई दिशा प्रदान की।
कुशोक बकुला रिनपोछे को श्रद्धांजलिः राजदूत ने महान बौद्ध विद्वान एवं मंगोलिया में भारत के पूर्व राजदूत कुशोक बकुला रिनपोछे को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि सोवियत संघ के विघटन के बाद आए आर्थिक संकट के दौर में उनका नैतिक मार्गदर्शन मंगोलिया के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ। उन्होंने मंगोलियाई जनता की ओर से भारत के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।
आर्थिक सहयोग और नए आयामः आर्थिक साझेदारी पर बोलते हुए राजदूत ने बताया कि दोनों देशों के बीच एक प्रमुख फ्लैगशिप परियोजना पर कार्य प्रगति पर है, जिसे भारतीय वित्तीय संस्थानों से प्रारंभिक सहायता मिली है। उन्होंने खनिज, खनन, क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के क्षेत्र में व्यापक संभावनाओं की ओर संकेत किया।
कृषि, रक्षा और शिक्षा को द्विपक्षीय संबंधों के उभरते स्तंभ बताते हुए उन्होंने जानकारी दी कि मंगोलिया ने पहली बार रक्षा अताशे की नियुक्ति की है और भारत के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने पर विचार चल रहा है।
पर्यटन और संपर्क के क्षेत्र में बेहतर हवाई सेवाओं की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि मंगोलिया भारतीय पर्यटकों के लिए एक नया और आकर्षक गंतव्य बन सकता है। शिक्षक एवं छात्र विनिमय कार्यक्रमों को जनस्तर पर संबंध सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम बताया।
नालंदा की विरासत और आधुनिक संदर्भः कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि भारत-मंगोलिया संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि साझा बौद्ध विरासत और ज्ञान परंपरा पर आधारित हैं।
उन्होंने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय तथा आचार्य श्वानजांग की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार की धरती का मंगोलिया से गहरा आध्यात्मिक संबंध रहा है।
उन्होंने कहा कि मंगोलिया ने ऐतिहासिक दबावों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा है और आज लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ अपनी सभ्यतागत जड़ों की ओर अग्रसर है। साथ ही भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अंतर्गत बौद्ध अध्ययन चेयर के पुनर्जीवन की आवश्यकता पर भी बल दिया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. सोनम लामो ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया, जबकि संचालन डॉ. रवि शंकर ने किया। इस अवसर पर संकाय सदस्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
राजगीर की इस ज्ञानगोष्ठी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि नालंदा की प्राचीन ज्योति आज भी भारत-मंगोलिया संबंधों को आलोकित कर रही है। स्रोत: राजगीर रिपोर्टर







