
जमुई/इस्लामपुर (नालंदा दर्पण)। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती को केवल पारंपरिक धान-गेहूं तक सीमित न रखकर उसे आय और उद्यमिता का सशक्त माध्यम बनाने की दिशा में रविवार को जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड के ग्राम बेला में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली। अनुसूचित जनजाति उपयोजना (TSP) के अंतर्गत औषधीय एवं सुगंधीय पौधों की खेती के माध्यम से कृषि उद्यमिता विकास विषय पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम पान अनुसंधान केन्द्र इस्लामपुर (नालंदा) द्वारा बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) के अंतर्गत संचालित अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगंधीय पौध परियोजना के तहत आयोजित किया गया। कार्यक्रम में स्थानीय किसानों को आधुनिक तकनीक आधारित खेती, प्रसंस्करण और विपणन की जानकारी देकर उन्हें कृषि आधारित उद्यमिता की ओर प्रेरित किया गया।
कम लागत, अधिक लाभ का विकल्पः प्रशिक्षण के दौरान वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि बदलते कृषि परिदृश्य में औषधीय एवं सुगंधीय पौधों की खेती किसानों के लिए आय का नया और लाभकारी स्रोत बन सकती है।
इस्लामपुर मगही पान अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. एस.एन. दास ने कहा कि एलोवेरा, तुलसी, लेमनग्रास और अश्वगंधा जैसे पौधों की बाजार में लगातार बढ़ती मांग है। इन फसलों की विशेषता यह है कि इन्हें अपेक्षाकृत कम लागत और सीमित संसाधनों में भी उगाया जा सकता है, जबकि इनसे होने वाला लाभ पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकता है।
उन्होंने बताया कि आयुर्वेद, कॉस्मेटिक उद्योग और हर्बल उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण औषधीय पौधों का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से इन फसलों की खेती अपनाते हैं तो वे स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे कृषि उद्योग स्थापित कर सकते हैं।
किसानों को दी गई वैज्ञानिक खेती की जानकारीः प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को औषधीय एवं सुगंधीय पौधों की खेती के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया गया। इसमें उन्नत किस्मों का चयन, पौध तैयार करने की विधि, खेत की तैयारी, सिंचाई प्रबंधन, रोग-कीट नियंत्रण, कटाई-छंटाई, प्रसंस्करण तथा विपणन के व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने किसानों को यह भी बताया कि इन पौधों से प्राप्त उत्पादों जैसे हर्बल तेल, औषधीय अर्क और प्रसंस्कृत सामग्री का मूल्य बाजार में अधिक होता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर मिलते हैं।
आधुनिक तकनीक अपनाने की सलाहः कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित अर्जुन मंडल ने किसानों से अपील की कि वे कृषि के नए विकल्पों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने की दिशा में आगे आएं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में खेती को व्यवसाय के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है और औषधीय पौधों की खेती इस दिशा में एक प्रभावी कदम हो सकती है।
विशिष्ट अतिथियों में डॉ. प्रभात कुमार, डॉ. अजीत कुमार पांडेय, नरेश राणा (प्रमुख), रामस्वरूप साह, रवि कुमार (किसान सलाहकार) तथा शंभू यादव (कंसल्टेटिव एक्सपोर्टर) ने भी किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री का उपयोग करने, बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन करने और समूह आधारित खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी।
स्थानीय किसानों की सक्रिय भागीदारीः प्रशिक्षण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय किसान उपस्थित रहे। किसानों ने विशेषज्ञों से सीधे संवाद कर खेती से जुड़ी अपनी समस्याओं और जिज्ञासाओं को रखा। वैज्ञानिकों ने उनके सवालों का समाधान करते हुए उन्हें औषधीय एवं सुगंधीय पौधों की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएं और किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन व बाजार से जोड़ने की व्यवस्था की जाए, तो औषधीय खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा सकती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकती है।
कृषि से उद्यमिता की ओर बढ़ते कदमः कृषि विशेषज्ञों के अनुसार औषधीय एवं सुगंधीय पौधों की खेती केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रसंस्करण, पैकेजिंग और निर्यात जैसे कई नए रोजगार के अवसर भी पैदा करती है। इससे ग्रामीण युवाओं के लिए भी कृषि क्षेत्र में स्वरोजगार के नए द्वार खुल सकते हैं।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने किसानों से अपील की कि वे प्रशिक्षण में मिली जानकारी को व्यवहार में लाकर अपने खेतों में नई संभावनाओं को साकार करें, ताकि खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सके। समाचार स्रोतः रामकुमार वर्मा/ नालंदा दर्पण







