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हिलसा में JDU और RJD के बीच कांटे की टक्कर, जानें किसका पलड़ा भारी?

हिलसा (नालंदा दर्पण)। बिहार के राजनीतिक पटल पर हिलसा विधानसभा सीट हमेशा से ही एक ऐसा युद्धक्षेत्र रही है, जहां हर चुनाव में वोटों की अंतिम गिनती तक सांसें थम जाती हैं। नालंदा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली यह सामान्य श्रेणी की सीट न केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले की सियासत का केंद्र बिंदु है, बल्कि जनता दल यूनाइटेड (JDU) और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बीच अनवरत संघर्ष का प्रतीक भी।

बीते 2020 के विधानसभा चुनाव में महज 12 वोटों के अंतर से जेडीयू (JDU) के कृष्ण मुरारी शरण ने आरजेडी (RJD) के अत्रिमुनि उर्फ शक्ति यादव को पटखनी दी थी। यह अंतर इतना बारीक था कि पूरे देश की नजरें इस सीट पर ठहर गईं।

अब 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में एक बार फिर वही कांटे की टक्कर दोहराने की पूरी संभावना है। क्या जेडीयू अपना किला बरकरार रख पाएगी या आरजेडी 2020 की हार का बदला लेगी? आइए, इस सीट के इतिहास, चुनौतियों और संभावित समीकरणों को विस्तार से समझते हैं।

बता दें कि हिलसा नालंदा जिले का एक ऐसा क्षेत्र है जो प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की विरासत को समेटे हुए है, लेकिन आधुनिक राजनीति में यह जातीय गोलबंदी, गठबंधन की चालबाजियों और विकास के मुद्दों का अखाड़ा बन चुका है। यहां की आबादी शहरी और ग्रामीण का अनोखा मिश्रण है।

एक ओर हिलसा नगर निकाय क्षेत्र में व्यस्त बाजार और यातायात की हलचल है, वहीं दूसरी ओर आसपास के गांव कृषि पर पूरी तरह निर्भर हैं। क्षेत्र के अधिकांश किसान धान, गेहूं और सब्जियों की खेती पर गुजारा करते हैं, लेकिन अपर्याप्त सिंचाई सुविधाओं और बाढ़ की समस्या ने इन्हें हमेशा परेशान किया है। स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सृजन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वे दिल्ली, मुंबई, गुजरात, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में मजदूरी के लिए पलायन कर जाते हैं।

शहरी इलाकों में जल निकासी की कमी, स्वच्छता अभियान की धीमी गति और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याएं आम हैं। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार की मांगें हर चुनावी रैली में गूंजती हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाइयों का अभाव, बाढ़ और सुखाड़ जैसे मुद्दे मतदाताओं के गुस्से का सबब बनते हैं।

विकास के इन मुद्दों के बीच राजनीतिक दलों के लिए जातीय समीकरणों को संभालना सबसे बड़ी कला है। हिलसा में चुनाव परिणाम अक्सर गठबंधनों और सामाजिक ध्रुवीकरण पर टिके होते हैं, जो इसे और भी रोचक बनाता है।

चुनाव आयोग द्वारा 30 सितंबर 2025 को जारी अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक, हिलसा में कुल मतदाताओं की संख्या 3 लाख से अधिक हो चुकी है, जो नालंदा जिले की सबसे बड़ी वोटर संख्या वाली सीटों में शुमार है। इसमें लगभग 1.59 लाख पुरुष और 1.43 लाख महिला मतदाता शामिल हैं।

2020 के बाद मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो युवाओं और महिलाओं के पंजीकरण अभियान का नतीजा माना जा रहा है। हालांकि औसत मतदान प्रतिशत 51% से 55% के बीच रहता है, जो एक चिंता का विषय है।

स्वीप (सिस्टेमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन) अभियान के तहत जिला प्रशासन ने जीविका दीदियों और आंगनबाड़ी सेविकाओं के माध्यम से जागरूकता रैलियां चलाई हैं। 6 नवंबर को होने वाले पहले चरण के मतदान के लिए ईवीएम मशीनें पहले ही वेयरहाउस से बज्रगृह पहुंचा दी गई हैं और प्रशासन फ्लैग मार्च के जरिए शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने में जुटा है।

हिलसा का चुनावी दांव-पेंच सबसे ज्यादा जातीय गोलबंदी पर निर्भर करता है। यहां यादव मतदाता (आरजेडी का मजबूत आधार) और कुर्मी समुदाय (जेडीयू का पारंपरिक वोट बैंक) की संख्या काफी ज्यादा है। दोनों ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा 10-12% मुस्लिम वोट, अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और दलित मतदाता भी परिणाम को झुकाव दे सकते हैं।

आरजेडी यादव-मुस्लिम समीकरण पर दांव लगाती है, जबकि जेडीयू कुर्मी-ईबीसी गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश करती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में नालंदा सीट पर जेडीयू प्रत्याशी को हिलसा सेगमेंट में महज 188 वोटों की बढ़त मिली थी, जो इस संतुलन की नाजुकता को दर्शाता है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ ‘नारी शक्ति का वोट’ अभियान भी इस बार गेम चेंजर साबित हो सकता है।

हिलसा का इतिहास ही इसकी कांटे की टक्कर का आईना है। 2020 में जेडीयू के कृष्ण मुरारी शरण (उर्फ प्रेम मुखिया) को 61,848 वोट मिले, जबकि आरजेडी के शक्ति यादव को 61,836 यानि 12 वोटों का यह अंतर रिकॉर्ड में दर्ज हो गया। विवादों के बावजूद यह जीत जेडीयू के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी।

इससे पहले 2015 में आरजेडी के शक्ति सिंह यादव ने लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की दीपिका कुमारी को 2,600 से ज्यादा वोटों से हराया था। 2010 में भी जेडीयू का दबदबा रहा, लेकिन कुल मिलाकर यह सीट हमेशा एनडीए और महागठबंधन के बीच खींचतान का मैदान रही। इन करीबी रिजल्ट्स ने साबित किया है कि यहां कोई भी गठबंधन या उम्मीदवार लापरवाही नहीं बरत सकता।

2025 के चुनावों में हिलसा एक बार फिर सुर्खियों में है। एनडीए ने जेडीयू से कृष्ण मुरारी शरण को ही दोबारा मैदान में उतारा है, जो 2020 की जीत के बाद और मजबूत नजर आ रहे हैं। नीतीश कुमार के गृह जिले का फायदा उठाते हुए वे विकास कार्ड खेलेंगे। जैसे कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा, सिंचाई परियोजनाएं और रोजगार योजनाएं।

वहीं महागठबंधन की ओर से आरजेडी ने अपने मुख्य प्रवक्ता शक्ति यादव को टिकट थमा दिया है, जो 2020 की हार को भुलाकर यादव-मुस्लिम वोटों को लामबंद करने में जुटे हैं। तेजस्वी यादव की अगुवाई में आरजेडी पलायन, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर हमला बोलेगी।

एनडीए का पलड़ा भारी लग रहा है, क्योंकि लोकसभा चुनावों में नालंदा पर उनकी बढ़त थी और कुर्मी वोट बैंक मजबूत है। लेकिन आरजेडी के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की लड़ाई है और स्थानीय तौर पर शक्ति सिंह यादव एक मजबूत खिलाड़ी माने जाते हैं और 12 वोटों की हार का बदला लेना उनका लक्ष्य है।

दोनों पक्षों ने प्रचार अभियान तेज कर दिया है। जेडीयू की रैलियों में नीतीश का जोर है तो आरजेडी की सभाओं में तेजस्वी का युवा अपील। विशेषज्ञों का मानना है कि मतदान प्रतिशत अगर 55% से ऊपर गया तो महिला और ईबीसी वोट निर्णायक होंगे।

कुल मिलाकर हिलसा विधानसभा सीट बिहार की राजनीति का एक जीवंत अध्याय है, जहां हर वोट की कीमत सोने के बराबर है। 2025 में यह टक्कर न केवल जेडीयू और आरजेडी के बीच होगी, बल्कि विकास बनाम जाति, स्थिरता बनाम बदलाव की भी। मतदाताओं के पास मौका है कि वे अपनी आवाज बुलंद करें। क्योंकि यहां 12 वोट भी इतिहास रच सकते हैं। 14 नवंबर को आने वाले रिजल्ट्स पर नजरें टिके रहेंगी। क्या प्रेम मुखिया अपना रिकॉर्ड बचाएंगे या शक्ति यादव ताज पहनेंगे? समय ही बताएगा।

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