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हिलसा नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी में लगे हैं सुर्खाब के पंख

हिलसा (नालंदा दर्पण)। हिलसा नगर परिषद में कार्यपालक पदाधिकारी रवि शंकर प्रसाद की दोबारा नियुक्ति ने एक बार फिर विवाद को जन्म दे दिया है। स्थानीय वार्ड पार्षदों और आम लोगों का कहना है कि करीब छह महीने पहले विवादों में घिरने के बाद उनका तबादला कर दिया गया था। लेकिन एक महीने पहले ही वे फिर से उसी पद पर वापस लौट आए हैं। इस पुनर्नियुक्ति के बाद से उनके कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर सवाल उठ रहे हैं और आरोप लग रहे हैं कि वे पहले से भी ज्यादा मनमानी कर रहे हैं। इससे नगर के विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि रवि शंकर प्रसाद की कार्यशैली हमेशा से चर्चा में रही है। छह महीने पहले उनके खिलाफ कई शिकायतें सामने आई थीं। जिनमें भ्रष्टाचार और काम में लापरवाही के आरोप शामिल थे। इन शिकायतों के बाद उनका तबादला कर दिया गया था। जिसे उस समय जनता ने राहत की सांस के रूप में देखा था। लेकिन उनकी अचानक वापसी ने सबको हैरान कर दिया है। एक वार्ड पार्षद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इनकी वापसी से साफ है कि इनके पास सत्ता में ऊंची पहुंच है। ऐसा लगता है कि कुछ प्रभावशाली लोग इन्हें संरक्षण दे रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो रवि शंकर प्रसाद को स्थानीय स्तर पर कुछ सफेदपोश नेताओं और प्रभावशाली लोगों का समर्थन प्राप्त है। कहा जा रहा है कि उनकी पुनर्नियुक्ति में इन लोगों की अहम भूमिका रही है। एक स्थानीय निवासी ने गुस्से में कहा कि जब ये पहले थे, तब सड़कें नहीं बनीं, नालियां जाम रहीं और सफाई व्यवस्था चौपट थी। अब फिर से वही हाल होने लगा है। ये विकास के लिए नहीं, अपनी जेब भरने के लिए आए हैं।

हिलसा नगर परिषद के कई वार्ड पार्षदों ने भी इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। एक पार्षद ने बताया कि रवि शंकर प्रसाद की मनमानी के चलते प्रस्तावित योजनाएं कागजों पर ही अटकी पड़ी हैं। हम पार्षदों की बात नहीं सुनी जाती। हर फैसला ये अपने हिसाब से लेते हैं। इससे जनता के बीच हमारी किरकिरी हो रही है।

कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी वापसी के बाद नगर परिषद के फंड का दुरुपयोग बढ़ गया है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि अगर सत्ता में रसूख के दम पर ऐसे अधिकारी बार-बार लौटते रहेंगे तो हिलसा का विकास कैसे होगा? इसकी जांच होनी चाहिए।

बहरहाल, हिलसा नगर परिषद में चल रहा यह विवाद अब स्थानीय राजनीति में भी हलचल मचा रहा है। आगे यह देखना दिलचस्प होगा कि रवि शंकर प्रसाद की पुनर्नियुक्ति का यह मामला कहां तक जाता है।

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