आरोप है कि इन लोगों ने श्रद्धालुओं को रोककर दान-दक्षिणा ली और पीछे के रास्ते से प्रवेश दिलाकर भीड़ को अनियंत्रित बना दिया…
बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। मघड़ा शीतला मंदिर में 31 मार्च को मंगलवारी पूजा के दौरान हुई दर्दनाक भगदड़ अब महज एक हादसा नहीं, बल्कि गंभीर प्रशासनिक और प्रबंधन विफलता के रूप में उभर रही है। इस घटना में आठ महिलाओं की मौत और कई श्रद्धालुओं के घायल होने के बाद अब पीड़ित पक्ष ने मंदिर प्रबंधन और पंडा समिति पर सीधे आरोप लगाए हैं।
दीपनगर निवासी अर्जुन सिंह द्वारा दर्ज करायी गई प्राथमिकी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि मंदिर के पुजारी और व्यवस्थापक श्रद्धालुओं से पैसे लेकर उन्हें पीछे के दरवाजे से प्रवेश करा रहे थे। इस अनौपचारिक VIP एंट्री के कारण मुख्य द्वार पर भीड़ का दबाव असामान्य रूप से बढ़ गया, जो अंततः भगदड़ का कारण बना।
क्या हुआ था उस दिन? 31 मार्च को मंगलवारी पूजा के कारण मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी थी। अर्जुन सिंह अपनी पत्नी कान्ती देवी के साथ पूजा के लिए पहुंचे थे। उनके अनुसार मुख्य प्रवेश द्वार पर अत्यधिक भीड़ और भीषण गर्मी के कारण लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे। इसी दौरान उनकी पत्नी भी भीड़ में गिर पड़ीं।
घायलों को तत्काल सदर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि उनकी पत्नी समेत आठ महिलाओं की मौत हो चुकी है। कई अन्य श्रद्धालु गंभीर रूप से घायल हुए, जिनका इलाज जारी है।
प्राथमिकी में किन-किन पर आरोप? प्राथमिकी में मुख्य पंडा मुन्ना लाल पांडेय समेत 16 नामजद और 20 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है। इनमें रविरंजन पांडेय, विवेका पांडेय, सोनू कुमार, रंजीत पांडेय, प्रभात पांडेय, दिलीप पांडेय, अशोक कुमार निराला, प्रीतम पांडेय, मिथिलेश पांडेय, धीरज कुमार, राजेश कुमार, सत्यम मिश्रा, निरंजन पांडेय, रोहित राउत और अवधेश पांडेय शामिल हैं।
अर्जुन सिंह का आरोप है कि इन लोगों ने श्रद्धालुओं को रोककर दान-दक्षिणा ली और पीछे के रास्ते से प्रवेश दिलाकर भीड़ को अनियंत्रित बना दिया। उन्होंने थानाध्यक्ष से सभी जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
पुलिस कार्रवाई और अब तक की स्थितिः इस मामले में दीपनगर थाना पहले ही प्राथमिकी दर्ज कर चुका है। पुलिस ने अब तक चार आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।
क्या यह रोकी जा सकने वाली त्रासदी थी? विश्लेषण के आधार पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह हादसा रोका जा सकता था? क्या मंदिर प्रबंधन ने भीड़ नियंत्रण के पर्याप्त इंतजाम किए थे? क्या ‘VIP एंट्री’ जैसी अव्यवस्थित व्यवस्था को रोका जा सकता था? क्या प्रशासन को पहले से भीड़ का अनुमान नहीं था?
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी धार्मिक आयोजन में एकल प्रवेश-निकास व्यवस्था, भीड़ के प्रवाह का वैज्ञानिक प्रबंधन और आपातकालीन निकास अत्यंत आवश्यक होते हैं। यहां इन बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी साफ नजर आती है।
प्रशासन और प्रबंधन पर बढ़ता दबावः घटना के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश है और प्रशासन पर जवाबदेही तय करने का दबाव बढ़ गया है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है।
बहरहाल, मघड़ा शीतला मंदिर भगदड़ कांड ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि धार्मिक आस्था के बड़े आयोजनों में छोटी-सी चूक भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच में क्या निष्कर्ष निकलता है और दोषियों पर कितनी सख्त कार्रवाई होती है।



