चौकीदारों की अनदेखी: गांवों में सुरक्षा का अभाव, अपराधियों का बोलबाला

गांवों और कस्बों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल पुलिस पर नहीं छोड़ी जा सकती। चौकीदारी व्यवस्था को पुनर्जीवित करना न केवल अपराध पर लगाम लगाने में मदद करेगा, बल्कि गांवों में विश्वास और सुरक्षा का माहौल भी बनाएगा

नालंदा दर्पण डेस्क। गांव और कस्बों की सुरक्षा का पहला दायित्व जिन चौकीदारों और दफादारों पर था, वह अब हाशिये पर है। यह समस्या केवल वर्तमान प्रशासन की देन नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही एक व्यवस्था की उपेक्षा का नतीजा है।

अंग्रेजी शासनकाल से लेकर आज़ाद भारत तक, चौकीदार व्यवस्था गांवों की सुरक्षा का अहम हिस्सा रही है। लेकिन आज नालंदा जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में यह व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।

थानेदारों की मनमानी से चौकीदारों का गिरता मनोबलः थानों के अधिकारी, जिन्हें ग्रामीण पुलिस व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए था, वे चौकीदारों का उपयोग केवल निजी सेवाओं के लिए कर रहे हैं।

चौकीदार अब थानों में सफाई कर्मचारी, माली, चालक, चपरासी, मुंशी के रूप में सीमित हो गए हैं। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि ग्रामीण इलाकों में अपराधों की रोकथाम के लिए तैनात ये चौकीदार अपने मुख्य कर्तव्यों से पूरी तरह दूर हो गए हैं।

थानेदारों की मनमानी के चलते चौकीदारों को रात में थाने पर तैनात किया जाता है या फिर बैंकों और सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा जाता है। इसके अलावा अदालतों में कैदियों को ले जाने और थाने के छोटे-छोटे काम भी इन्हीं के सिर पर डाल दिए जाते हैं। यह स्थिति चौकीदारों की असली भूमिका पर सवालिया निशान खड़ा करती है।

‘जागते रहो’ की परंपरा कहां खो गई? वो समय याद कीजिए जब चौकीदारों की गूंजती हुई ‘जागते रहो’ की आवाजें गांवों और कस्बों की गलियों में सुरक्षा का अहसास कराती थीं। आज यह परंपरा लगभग विलुप्त हो चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अपराध बढ़ रहे हैं और लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

चौकीदारों की जिम्मेदारी केवल गश्त लगाने तक सीमित नहीं है। वे गांव में अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने और पुलिस को सूचित करने का भी काम करते हैं। लेकिन अब प्रशासनिक उदासीनता और अफसरशाही रवैये ने इन्हें महज सरकारी डंडे या निजी सेवाओं तक सीमित कर दिया है।

चौकीदारों को लेकर हवा में बिहार सरकार का हर निर्देशः बिहार सरकार ने समय-समय पर निर्देश जारी किए कि चौकीदारों और दफादारों से उनके मैनुअल के अनुसार ही काम लिया जाए। इनका प्राथमिक कार्य गांव और मोहल्लों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। अफसरशाही के हिटलरशाही रवैये ने चौकीदारों को उनके असली काम से भटका दिया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते अपराध और चौकीदार की जिम्मेदारीः ग्रामीण इलाकों में अपराध बढ़ने के पीछे चौकीदार व्यवस्था की कमजोरी भी एक बड़ी वजह है। चौकीदार का पुलिस की ‘तीसरी आंख’ कहा जाता है। लेकिन अब वे अपराधियों पर नजर रखने में असमर्थ हो चुके हैं। आधुनिक अपराधों से निपटने के लिए इनके पास न तो आधुनिक उपकरण हैं और न ही पर्याप्त प्रशिक्षण।

समाधान क्या है? चौकीदारों को उनकी वास्तविक गांव की जिम्मेदारियों पर वापस लाने के लिए थानों की मनमानी पर लगाम लगानी होगी। चौकीदारों को आधुनिक उपकरण और हथियार उपलब्ध कराने होंगे।अपराध की बदलती प्रवृत्तियों को समझने और उनसे निपटने के लिए चौकीदारों को समय-समय पर प्रशिक्षण देने होंगे। बिहार सरकार के निर्देशों को सख्ती से लागू करनी होगी। ताकि चौकीदारों से उनके मैनुअल के अनुसार काम लिया जा सके।

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Nalanda Darpan

नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके। More »

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