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CM नीतीश के ड्रीम प्रोजेक्ट पर ग्रहण, अधर में लटका राजगीर एलिवेटेड रोड

राजगीर एलिवेटेड रोड परियोजना पर रोप-वे से लेकर वन क्षेत्र तक के प्रभावों पर विशेषज्ञों की राय और स्थानीय लोगों में मायूसी

नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्टों में शामिल राजगीर एलिवेटेड रोड फिलहाल अधर में लटका नजर आ रहा है। जिस परियोजना से राजगीर की वर्षों पुरानी यातायात समस्या के समाधान और पर्यटन विकास को नई उड़ान मिलने की उम्मीद थी, वह अब आपत्तियों, आशंकाओं और प्रशासनिक उलझनों में फंसी दिखाई दे रही है। वर्षों पूर्व स्वीकृति मिलने के बावजूद जमीन पर काम शुरू नहीं होने से स्थानीय लोगों में गहरी निराशा झलक रही है।

ड्रीम प्रोजेक्ट पर एएसआइ की चिंता

राजगीर एलिवेटेड रोड निर्माण में सबसे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की आपत्ति सामने आई। एएसआइ का स्पष्ट तर्क था कि प्रस्तावित एलिवेटेड रोड का मार्ग राजगीर की ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों के समीप से गुजरता है।

ऐसे में निर्माण कार्य के दौरान खुदाई, पायलिंग और भारी मशीनों के उपयोग से सदियों पुरानी संरचनाओं को नुकसान पहुंचने की आशंका है। राजगीर का इतिहास बौद्ध और जैन धर्म से गहराई से जुड़ा रहा है, इसलिए यहां किसी भी विकास परियोजना में अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता बताई गई।

गर्मजल कुंडों पर संकट की आशंका

एएसआइ की आपत्ति के बाद दूसरा बड़ा सवाल राजगीर के विश्व प्रसिद्ध गर्मजल कुंडों और प्राकृतिक झरनों को लेकर उठा। विशेषज्ञों का मानना है कि एलिवेटेड रोड के पायलिंग कार्य के दौरान किए जाने वाले गहरे गड्ढे भूमिगत जलधाराओं को प्रभावित कर सकते हैं।

राजगीर के गर्मजल कुंड केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि भूगर्भीय दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील संरचना हैं। यदि इन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, तो इसका असर न केवल पर्यटन बल्कि स्थानीय पर्यावरण संतुलन पर भी पड़ सकता है।

प्रशासनिक मंजूरी, लेकिन जमीन पर सन्नाटा

दिलचस्प बात यह है कि प्रशासनिक स्तर पर परियोजना को हरी झंडी मिल चुकी है, केंद्र सरकार के परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से भी स्वीकृति प्राप्त है, इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है।

फाइलों में दौड़ती योजनाएं और जमीन पर पसरा सन्नाटा इस परियोजना की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब सब कुछ मंजूर है तो फिर देरी क्यों?

मुख्यमंत्री का निरीक्षण और जगी उम्मीदें

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं इस परियोजना को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से पूर्व में स्थल निरीक्षण कर चुके हैं। उनके निरीक्षण के बाद राजगीर के नागरिकों, व्यापारियों और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों में नई उम्मीद जगी थी।

लोगों को लगा था कि अब दशकों पुरानी यातायात समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा और राजगीर विकास की नई राह पर आगे बढ़ेगा।

टूटती उम्मीदें और बढ़ती नाराजगी

लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद जब निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो वही उम्मीदें धीरे-धीरे निराशा में बदलने लगीं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि हर चुनाव से पहले इस परियोजना की चर्चा होती है, लेकिन चुनाव बीतते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। इससे आम जनता का भरोसा व्यवस्था पर कमजोर होता जा रहा है।

पटेल चौक बना जाम का प्रतीक

पर्यटन नगरी राजगीर का प्रमुख चौराहा पटेल चौक इन दिनों जाम की समस्या का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। यहां प्रतिदिन घंटों जाम लगना आम बात हो गई है।

स्कूल बसें, पर्यटक वाहन, निजी गाड़ियां और सार्वजनिक परिवहन सब एक ही जाम में फंसे नजर आते हैं। खासकर पर्यटन सीजन के दौरान स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

पर्यटन सीजन में हालात बदतर

राजगीर देश-विदेश के पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण है। लेकिन जब पर्यटक घंटों जाम में फंसे रहते हैं तो उनकी यात्रा का अनुभव खराब हो जाता है।

स्थानीय व्यवसायियों का कहना है कि कई बार पर्यटक जाम की वजह से अपनी यात्रा बीच में ही छोटा कर लेते हैं, जिससे व्यवसाय पर सीधा असर पड़ता है।

एलिवेटेड रोड से मिलती यातायात राहत

यदि एलिवेटेड रोड का निर्माण हो जाता तो शहर के भीतर से गुजरने वाले भारी वाहनों और पर्यटक बसों का दबाव काफी हद तक कम हो सकता था। इससे स्थानीय सड़कों पर यातायात सुचारु रहता और आम नागरिकों को रोजाना जाम से जूझना नहीं पड़ता।

पर्यटन को मिलती नई पहचान

एलिवेटेड रोड केवल एक यातायात परियोजना नहीं थी, बल्कि यह राजगीर के पर्यटन स्वरूप को नई पहचान देने वाली योजना थी। इस सड़क से गुजरते हुए पर्यटक राजगीर की हरी-भरी पहाड़ियों, घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य का विहंगम दृश्य देख सकते थे। यह अनुभव राजगीर को एक आधुनिक, पर्यावरण-संवेदनशील पर्यटन नगर के रूप में स्थापित कर सकता था।

होटल और स्थानीय व्यवसायों को लाभ

स्थानीय होटल मालिकों, दुकानदारों और टूर ऑपरेटरों का मानना है कि एलिवेटेड रोड के निर्माण से पर्यटकों की संख्या में इजाफा होता। इससे होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी सेवाओं और हस्तशिल्प से जुड़े छोटे व्यापारियों को सीधा लाभ मिलता। रोजगार के नए अवसर भी सृजित होते।

परियोजना का खाका और लागत

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने राजगीर में 8.7 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड रोड के निर्माण की स्वीकृति दी थी। इस परियोजना पर लगभग 1300 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। योजना के तहत रोप-वे के पास चढ़ने और उतरने के लिए रैंप का निर्माण भी प्रस्तावित था।

वन क्षेत्र से गुजरता अनोखा कॉरिडोर

एलिवेटेड रोड का अधिकांश हिस्सा राजगीर के वन क्षेत्र से होकर गुजरता, जिससे यह परियोजना अपने आप में अनूठी बन जाती। सड़क के दोनों ओर फैला हरियाली भरा परिदृश्य पर्यटकों के लिए एक यादगार अनुभव होता। साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण और विकास के संतुलन का उदाहरण भी बन सकती थी।

दक्षिण से उत्तर तक प्रस्तावित मार्ग

योजना के अनुसार, एलिवेटेड रोड का निर्माण राजगीर के दक्षिण में नालंदा–नवादा सीमा पर स्थित वनगंगा पुल से लेकर उत्तर दिशा में राजगीर–बिहारशरीफ मार्ग पर पंडितपुर के पास तक होना था। कुल 8.7 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर में से 7.40 किलोमीटर हिस्सा एलिवेटेड होना प्रस्तावित था।

30 महीनों में पूरा होने का लक्ष्य

परियोजना के लिए 30 महीनों में निर्माण कार्य पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया था। पथ निर्माण विभाग ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था, जिसे मंजूरी भी मिल चुकी है। इसके बावजूद समय सीमा अब कागजों में ही सिमटकर रह गई है।

बाधाएं या इच्छाशक्ति की कमी?

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या परियोजना वास्तव में केवल तकनीकी और पर्यावरणीय बाधाओं के कारण रुकी है, या फिर कहीं न कहीं प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी भी इसकी वजह है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी संबंधित एजेंसियां आपसी समन्वय से काम करें, तो समाधान निकाला जा सकता है।

स्थानीय लोगों की मांग: जल्द फैसला हो

राजगीर के स्थानीय नागरिक अब स्पष्ट फैसला चाहते हैं। उनका कहना है कि या तो परियोजना को संशोधित कर जल्द शुरू किया जाए, या फिर कोई वैकल्पिक योजना लाकर यातायात समस्या का समाधान किया जाए। अनिश्चितता की स्थिति सबसे ज्यादा नुकसानदायक है।

भविष्य की राह और उम्मीद

अब देखना यह है कि सरकार और संबंधित विभाग इन तमाम आपत्तियों और आशंकाओं का समाधान निकालकर इस ड्रीम प्रोजेक्ट को कब साकार कर पाते हैं। राजगीर के विकास, पर्यटन और आम जनता की सुविधा के लिए यह परियोजना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी मंजूरी के समय थी। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या यह सपना हकीकत बन पाएगा या फाइलों में ही सिमटकर रह जाएगा?

स्रोतः नालंदा दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय

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